भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 747

स्वभावसे ही प्राणि जात । अनादि पापके पड हाथ । बन गये त्रिगुणके साथ । एक रूपसे ॥ ५६ ॥ उसमें पाते वे अवनति । तथा चाहते हैं वे उन्नति । होती है तब वैसी ही वृत्ति । जीवोंकी सब ॥ ५७ ॥ वृत्ति-सा तब संकल्प करते । संकल्प-सा सब कर्म करते । तथा कर्मानुसार ही करते । शरीर-धारण ॥ ५८ ॥ बीज मिटकर वृक्ष होता । फिर वृक्ष बीजमें समाता । कल्पोंसे ऐसे चलता आता । किंतु न नाशता वृक्ष ॥ ५९ ॥ उसी भांति है यहां अपार । होता रहता है जन्मांतर । त्रिगुणत्व अव्यभिचार । प्राणियोंके साथ ॥ ६० ॥ इसीलिये प्राणियोंके साथ । रहती है श्रद्धा जो सतत । जैसे होते गुण वैसे पार्थ । यह जान तू ॥ ६१ ॥ बढता कभी सत्वशुद्ध । ज्ञानकी चाह होती सिद्ध । किंतु दोनों होते विरुद्ध । यहां तब ॥ ६२ ॥ होती तब सत्य विषयक । श्रद्धा जो मोक्ष-फल दायक । किंतु रज तम सहायक । होंगे क्या कभी ॥ ६३ ॥ सत्वके बलको तोड कर । चढता रज आकाश पर । होती तब श्रद्धा कूडा घर । कर्म-उसका झाडू ॥ ६४ ॥ फिर उठती तमकी आग । करती है वह श्रद्धा भंग । तब चाहता विषय-भोग । भोगनेमें निषिद्ध ॥ ६५ ॥ सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत । श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥ ३ ऐसे है सत्व रज तम । श्रद्धा-रूप जान सुधर्म । नहीं रखता जीव ग्राम । इससे कुछ भिन्न ॥ ६६ ॥ स्वभाव जिसका जैसे श्रद्धा वैसे मिले उसे । श्रद्धासे ही बना जीव श्रद्धा-सा वह भी रहा ॥ ३ ६७५ श्रद्धा-निरूपण-योग