भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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करता है जो दानका अंगीकार । न कर सके कभी प्रत्युपकार । वैसे रहता दाताको भूलकर । चितमें भी वह ॥ ८२ ॥ ऐसी परिस्थितिमें जो दान । सहज दिया गया अर्जुन । जान तू वही सात्विक दान । सबमें श्रेष्ठ ॥ ८३ ॥ वही है स्थल और काल । घटता पात्रका सुमेल । दान-भाग भी है निर्मल । होना न्यायगत ॥ ८४ ॥ यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः । दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥ २१ ॥ राजसिक दान— दूधकी आशा मनमें रखकर । लाते हैं नित गायको चराकर । तथा उपजकी आशा रखकर । करते खेत जैसे ॥ ८५ ॥ या दृष्टि रख उपहार पर । बुलाते हैं आप्तोंको घर पर । या वायन भेजते घर पर । गोद भरनेवालोंके ॥ ८६ ॥ काटकर सूदका धन । देते हैं जैसे आप ऋण । या लेकर शुल्कका धन । औषध वैद्य ॥ ८७ ॥ जैसे जिसे दिया जो दान । काम आये वह स-साधन । ऐसी भावना रख अर्जुन । दिया जाता जो ॥ ८८ ॥ अथवा कोई राह चलता । जो है किसी काम नहीं आता । मिलता है तब पांडुसुत । द्विजोत्तम ऐसा ॥ ८९ ॥ एक भी कवडीके लिये । गोत्रजोंने जो पाप किये । सर्व प्रायश्चित्तके लिये । छोडता उदक ॥ २९० ॥ वैसे ही पारलौकिक । वांछना रख अनेक । दिया जाता वह एक । ग्रासमें भी न आता ॥ ९१ ॥ उपकार अपेक्षासे अथवा फल चाहके । क्लेश-पूर्वक जो देते जान तू दान राजस ॥ २१ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९६

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