भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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युद्धवर्णन— “सुनो” तब वह संजय बोला। पांडवी सेनाने किया हमला। जैसे महा-प्रलयमें है फैला। कृतांत मुख ॥ ८८ ॥ सेना मानो महापूर जैसे। चढ आती है जो उग्रतासे। उबलता कालकूट जैसे। रोके कौन ? ॥ ८९॥ अथवा जैंस बड़वानल भड़का। उसको साथ मिला प्रलय-वातका। उठा जो शोषण करके सागरका। आकाश तक ॥ ९० ॥ ऐसा वह दल दुर्धर। व्यूह रचनामें चतुर। जिससे अति भयंकर। दीखता है॥ ९१ ॥ जिसे देखकर दुर्योधन। उपेक्षा करके अनमन। जैसे न गिनता पंचानन। गज-समूहको ॥ ९२ ॥ गया वह गुरुके पास। बात कही है स-उल्हास। उछला सेनाका उल्हास। देखो पांडवोंकी ॥ ९३ ॥ गिरि-दुर्ग चलते हैं जैसे। विविध व्यूह बनते वैसे। रचा अति कुशलतासे। द्रुपद-पुत्रने ॥९४॥ किया जो आपने ही शिक्षित। विद्यासे किया है ज्ञानवंत। रचा सैन्य-सिंह सुशोभित। उसने देखें ॥ ९५॥ अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुन समायुधि। युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥४॥ और भी हैं असाधारण। शस्त्रास्त्रमें हैं जो प्रवीण। क्षात्र-धर्ममें हैं निपुण। अन्यवीर ॥ ९६ ॥ जो हैं बल प्रौढ़ि पौरुषमें। भीम अर्जुनकी समतामें। कहूंगा मैं इस प्रसंगमें। नाम उनके ॥ ९७॥ यहां युयुधानु सुभट। आया वह वीर विराट। वैसे ही महारथी श्रेष्ठ। द्रुपदराज ॥ ९८॥ यहां शूर धनुर्धारी जैसे हैं भीम अर्जुन। महारथी जो द्रुपद विराट नृप सात्यकी ॥ ४ ॥ ९ अर्जुनविषादयोग (२)