भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 770

जब देख तमोगुणी संपन्न । भाग्यसे आया कोई लेने दान । तब वह फूलता साभिमान । नशामें उन्मत्तसा ॥ २ ॥ नहीं होती मन में श्रद्धा पार्थ । न झुकाता वह अपना माथ । आप नहीं करता या कराता । अर्घ्यादिक ॥ ३ ॥ नहीं देता अभ्यागतको आसन । वहां गंधाक्षतकी बात ही कौन । तामसमें कहां ये सब लक्षण । कह तू होंगे संभव ॥ ४ ॥ कुछ देकर जैसे लौटाते ऋणदाता । वैसे उसके हाथमें वह कुछ देता । तू तुकार कर बोलना उसका होता । स्वभाव सदैव ॥ ५ ॥ जिसको जो कुछ जब वह देता । उसीमें करता उसकी योग्यता । या उसका अपमान भी करता । कुवचनोंसे ॥ ६ ॥ होता है जो इस प्रकार । धन देता पांडुकुमार । उसे कहता चराचर । तामस दान ॥ ७ ॥ सत्वको स्पष्ट करनेके लिये रज तम दिखाया है— ऐसे हैं जिनके लक्षण । इन लक्षणोंके जो तीन । कहे हैं ये दान दे ध्यान । रज तम पर ॥ ८ ॥ यहां मैं यह जानता । मनमें है तू सोचता । तेरी यह कल्पकता । है विलक्षण ॥ ९ ॥ जो है भव-बंध मोचक । कहा गया कर्म सात्विक । तब क्यों कहता सदोष । कर्मका लक्षण ॥ ३१० ॥ जैसे पिशाचको नहीं हटाते । गढ़ा हुवा धन न पा सकते । या यदि धुंएको नहीं सहते । न लगता दीप ॥ ११ ॥ शुद्ध सत्व पर भी वैसे सतत । पट पडता रज-तमका पार्थ । उसको भेदनेकी यह जो बात । अस्वाभाविक क्या ? ॥ १२ ॥ श्रद्धा दानादि जो सभी पार्थ । हमने तुझको क्रियाजात । कहे हैं अब उसमें व्याप्त । तीनों ही गुण ॥ १३ ॥ वहां कहनेके ये जो तीन । उद्देश्य न रखता था मन । बतानेमें सत्वके लक्षण । कहे ये दो भी ॥ १४ ॥ ज्ञानेश्वरी ६९८