ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंयज्ञादिके आदि लेनेका मंगल-नाम— ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः । ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥ २३ ॥ ऐसे अनादि परब्रह्म । जगदादि विश्रामधाम । उसका है एकही नाम । कहा तीन प्रकारसे ॥ २८ ॥ वास्तविक वह नाम जाति रहित । किंतु पडे जो अविज्ञातममें ग्रस्त । उनके लिये श्रुतिने किया चिन्हित । जाननेमें उसे ॥ २९ ॥ नव जात शिशुको जैसे । कोई नाम न होता उसे । बुलाते तो रखे नामसे । जी कह उठता ॥ ३३० ॥ संसार-दुःखसे जो हैं पीडित । जीव आते उसके पास नित । उनको ओ ! देता है संकेत । जो यह नाम ॥ ३१ ॥ मिटे पर-ब्रह्मका चिर-मौन । तथा अद्वयत्वसे हो मिलन । ऐसा मंत्र दिया हो सकरुण । श्रुति-माताने ॥ ३२ ॥ वेदका दिया हुवा जो नाम । सुनते ही वह पर-ब्रह्म । सम्मुख आता वह परम । होता जो पीछे ॥ ३३ ॥ किंतु निगमाचल शिखर पर । बसे जो उपनिषदार्थ नगर । करते वहां ब्रह्म सह विहार । वही जानते यह ॥ ३४ ॥ रहने दे वह प्रजापति । रखता सृष्टि कर्तृत्व-शक्ति । उसका आधार है आवृत्ति । इस नामकी ॥ ३५ ॥ हुवा जब सृष्टिका उपक्रम । सुन अर्जुन उसके प्रथम । पगलाया हुवा-सा यह ब्रह्म । था अकेला ही ॥ ३६ ॥ मुझ ईश्वरको जो न जानता । तथा सृष्टि भी न कर सकता । ऐसेको वह महान बनाता । नाम एक ॥ ३७ ॥ ॐ तत्सत् तीन नामोंसे किया निर्देश ब्रह्मका । जिससे ये हुए वेद यज्ञ याज्ञिक आदि में ॥ २३ ॥ ज्ञानेश्वरी ७००