ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 780, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रद्धाहीन कार्य कभी सफल नहीं होता— अथवा नामको छोड़कर । तोड़कर श्रद्धाका आधार । दुराग्रह बल बढ़ाकर । धनंजय ॥ १४ ॥ अश्वमेघ किये अगणित । रत्नमय पृथ्वी-दान पार्थ । एकांगुष्ठ तप भी सतत । किया गया ॥ १५ ॥ जलाशयके नाम पर । बन गये नये सागर । किंतु वे सब धनुर्धर । व्यर्थ ही मान ॥ १६ ॥ पत्थर पर मेघ बरसना । या राखमें हवन किया जाना । या प्रेमसे आलिंगन करना । अपनी छायाका ॥ १७ ॥ या आकाशको बेंत । मारना जैसे पार्थ । वैसे ही सब है व्यर्थ । यह समारोह ॥ १८ ॥ कोल्हूमें कंकडका घान डाला । उससे न खली न तेल मिला । किंतु अपना दारिद्र्य सकल । रहा साथ ही ॥ १९ ॥ गांठमें बंधा हुवा ढेला । यहां या वहां नहीं चला । जिससे मर गया भला । उपवाससे ॥ ४२० ॥ वैसे कर्म जात सफल । नहीं देते हैं यहां फल । तब होंगे वहां विफल । कहना रहा क्या ॥ २१ ॥ ब्रह्म नामकी श्रद्धा तजकर । करनेमें ये सभी व्यवहार । व्यर्थ ही जान तू पांडुकुमार । केवल दिखानेके ॥ २२ ॥ जो कलुष-कुल-केसरी । त्रिताप-तिमिर-तमारी । वीरवर श्रीनरहरी । बोलते ऐसे ॥ २३ ॥ निजानन्दमें तद्रूप । हुवा तब परंतप । चंद्रमा जैसे तद्रूप । होता चांदनीसे ॥ २४ ॥ अजी ! यह युद्ध ऐसा देखा । वाणी तथा बाणके जो नोक । नापते हैं जीव सह एकेक । मांस खंड ॥ २५ ॥ ज्ञानेश्वरी ७०८