भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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अब अपने दलके नायक । हैं जो दृढ वीर तथा सैनिक । सुनिये सभी ध्यान पूर्वक । कहता हूं मैं ॥ ३ ॥ आप तथा अन्य जो हैं । मुख्य रुपसे दीखते हैं । यह केवल संक्षेप है । कहता हूं सुनिये ॥ ४ ॥ यह है भीष्म गंगा नंदन । प्रतापमें हैं भानु समान । हैं जो रिपु-गज-पंचानन । कर्ण महाबीर ॥ ५ ॥ इसमें एकेकका मनो-व्यापार । करता है विश्वोत्पत्ति औ' संहार । यह कृप आचार्य है महावीर । अपर्याप्त हैं क्या ? ॥ ६ ॥ यह विकर्ण भी वीर है । यह अश्वत्थामा खड़ा है । हियमें जिसका डर है । कृतांतके भी ॥ ७ ॥ सौमदत्ति है समितिंजय । करने आये मेरी विजय । धाता न जाने जिनका शौर्य । ऐसे हैं अनेक ॥ ८ ॥ अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः ॥ ९ ॥ जो शस्त्र-विद्या पारंगत । तथा मंत्रावतार मूर्त । अस्त्रमात्रके जो अभ्यस्त । पूर्ण रुपसे ॥ ९ ॥ अप्रतिम जो मल्ल-जगतमें । पूर्ण प्रताप जिनके तनमें । परंतु सर्व-प्राणं जो मुझमें । लगाया है ॥ ११० ॥ जैसे है पतिव्रताका हृदय । पति बिन न स्पर्शे अन्य काया । वैसे सर्वस्व है मुझको दिया । इन सुभटोंने ॥ ११ ॥ हमारे कार्य सिध्यर्थ । इन्होने दिया जीवित । ऐसे हैं ये स्वामि-भक्त । निस्सीम ॥ १२ ॥ हैं ये युध्द कलामें निपुण । यश प्राप्तिमें दक्ष महान । क्षात्र नीतिका है जनन । हुआ इनसे ॥ १३ ॥ अनेक दूसरे वीर मैरे हित सभी तज । सजे हैं सब शस्त्रोंसे रणमें दक्ष जो सदा ॥ ९ ॥ ११ अर्जुनविषादयोग

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