भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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तुझे अब वह कुशलता । कहता सुंदरतासे पार्था । कर्मसे कर्मही है मिटता । जिससे यहां ॥ ६५ ॥ एतान्यापि तु कर्माणि संगंत्यक्त्वा फलानि च । कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥ ६ ॥ कर्म-नाशकी कर्म-कुशलता— महा यागादि सब प्रमुख । कर्म-संपन्न होते हैं नेक । कर्तापनकी अहंता देख । रहती नहीं ॥ ६६ ॥ जैसे जो मूल्यसे यात्रा करता । उसको यात्राका गर्व न होता । उसको हृदयमें नहीं होता । यात्राका आनंद ॥ ६७ ॥ अथवा जो राजाकी आज्ञासे । लड़ता रहता है राजासे । अभिमान नहीं होता उसे । जीतता मैं राजाको ॥ ६८ ॥ अन्योंकी सहायतासे जो तरता । उसको तरनेका गर्व न होता । अथवा पुरोहित न धरता । दातृत्वका गर्व ॥ ६९ ॥ वैसे कर्तृत्वका अहंकार । नहीं लेते यथा अवसर । कर्म-मात्र सभी धनुर्धर । करना पूर्ण ॥ १७० ॥ तथा कर्म किया अर्जुना । इससे है फलका आना । ऐसी अपेक्षा न धरना । मनमें कभी ॥ ७१ ॥ फलकी आशा छोड़कर । कर्म करना धनुर्धर । पराया बच्चा निरंतर । देखती धात्री जैसे ॥ ७२ ॥ बिना किये ही फलकी आशा । तुलसीमें पानी देते जैसा । वैसे ही हो फलमें निराशा । करना कर्म ॥ ७३ ॥ न करके दूधकी आशा ग्वाल । करता गांवके पशु संभाल । उसी भांति मान कर्मका फल । करना कर्म ॥ ७४ ॥ किंतु पुण्य-कर्म भी ये ममत्व-फल छोड़के । करना योग्य है मेरा जान उत्तम निर्णय ॥ ६ ॥ ७२५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद योग