भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 799, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 799

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् । स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्याग फलं लभेत् ॥ ८ ॥ कार्यारंभका जो उगम । कष्टकर होता प्रथम । लगता ढोना भारी काम । पाथेय जैसे ॥ ८५ ॥ कडुआ लगता है नीम । कशैला हर्रा प्रथम । प्रारंभमें वैसे काम । लगता सदैव ॥ ८६ ॥ गायका दोष है सींग । सेवंतीका कंटकांग । भोजन सुख महंगा । पकानेमें ॥ ८७ ॥ होता वैसे प्रारंभमें कर्म । आरंभमें होता है विषम । इसीलिये करनेमें श्रम । मानता है वह ॥ ८८ ॥ आरंभता है कर्म समस्त । वैसे यह जो शास्त्र - सम्मत । किंतु आंच आते ही व्यथित । हो तजता सब ॥ ८९ ॥ कहता संपत्ति शरीर जैसी । मिली है अतीव भाग्यसे ऐसी । कर्मादिकमें यह व्यर्थ वैसी । खपाना है पाप ॥ १९० ॥ किया हुवा कर्म कभी देगा फल । किंतु मिला है यह सुंदर फल । इसको अभी भोगनेमें कुशल । नहीं है क्या ? ॥ ९१ ॥ इस भांति शरीर - क्लेशसे । भीत हो तजता कर्म जैसे । कहलाता है सुन तू इसे । राजस त्याग ॥ ९२ ॥ इसमें भी होता है कर्म-त्याग । किंतु न मिलता त्यागका योग । अपनेसे गिर होता है त्याग । उसी भांति ॥ ९३ ॥ अथवा प्राण गये डूबकर । "अधोदकमें समाधि पाकर” । ऐसे नहीं कहते धनुर्धर । वह दुर्मरणही ॥ ९४ ॥ ऐसे शरीरका लोभ । तजाता है कर्म जब । नहीं मिलता है लाभ । कर्म-त्यागका ॥ ९५ ॥ कष्ट कारण जो कर्म तजता तन चोरके । त्याग राजस जो व्यर्थ न देखें अपना फल ॥ ८ ॥ ७२७ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद मोग