भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इस लिये कर्म और कर्ता । इस द्वैत-भावकी जो वार्ता । न जानता वह पांडुसुता । सात्विक त्याग ॥ १६ ॥ इस भांति वह कर्म-पार्था । तजे तो छूट जाते सर्वथा । अधिक बांधते है अन्यथा । तजे तो कर्म ॥ १७ ॥ न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः । यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥ देह-धारीको कर्म अनिवार्य है— वैसे ही जो पांडुकुमार । देहकी मूर्ति बनकर । रहता कर्मसे ऊबकर । वह है अनाडी ॥ १८ ॥ उकताकर मृत्तिकासे । रहेगा कहो घडा कैसे । तथा कपडा तंतुओंसे । कैसे रहे दूर ॥ १९ ॥ जैसे अग्नि अपनी उष्णता । त्यजेगा कैसे कह तू पार्थ । अथवा कैसे करेगी जोत । प्रकाशसे द्वेष ॥ २२० ॥ द्वेष कर अपनी उग्रतासे । सुगंध लायेगा हींग कहांसे । अथवा द्रवत्व छोड़के कैसे । रहेगा पानी ॥ २१ ॥ वैसे लेकर शरीरका आकार । करता रहता है सभी व्यवहार । तब कैसे है उन्माद धनुर्धर । कर्म-त्यागका ॥ २२ ॥ अपना लगाया हुवा तिलक । पुनः पुनः पोंछते स-कौतुक । किंतु निकालकर क्या मस्तक । लगा सकते हैं ॥ २३ ॥ वैसे विहित जो स्वयं स्वीकृत । सहज तज सकते हैं पार्थ । किंतु जो देह बन आया साथ । वह कर्म तजे कैसे ॥ २४ ॥ चलता जो श्वासोच्छ्वास । नींदमें भी रात-दिवस । न करना सा अहर्निश । चलता कर्म ॥ २५ ॥ अशक्य देहधारीको सर्वथा कर्म छोडना । इसीलिये फल-त्यागी त्यागी वह कहा गया ॥ ११ ॥ ज्ञानेश्वरी ७३०