ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअपना सामर्थ्य न देखता । आगेका विचार न करता । मनमें जो आता सो करता । न देखता कुछ ॥ २१ ॥ मेरा सामर्थ्य कितना । कर्मकी कैसी है घटना । करने पर है क्या होना । सोचता नहीं ॥ २२ ॥ इस भांतिसे सब जो विचार । अविवेक पगसे पोंछकर । उद्यत होता है स-अहंकार । कर्ममें वह ॥ २३ ॥ अपना ही आसरा जलाकर । भड़कता है अग्नि भयंकर । या मर्यादा भंग कर सागर । उमड पड़ता ॥ २४ ॥ तब कम अधिक न जानता । आगे पीछे कुछ भी न देखता । पथ कुपथ भी एक करता । तामस कर्म ॥ २५ ॥ कृत्याकृत्य ऐसा कुछ लेकर । आप पर विचार भी न कर । होता है जो कर्म धनुर्धर । निश्चय ही तामस ॥ २६ ॥ ऐसे गुणत्रय भिन्न । कर्मकी स्थिति अर्जुन । यह किया विवेचन । कारणों सह ॥ २७ ॥ अब इन कर्मोंको जो करता । कर्मोंके अभिमानसे जो कर्ता । वह जीव भी कैसे त्रिविधता । पाता है देख ॥ २८ ॥ जैसे होके चतुर्थाश्रमवश । चतुर्धा दीखता एक पुरुष । कर्ता दीखता कर्मभेद वश । तीन प्रकारका ॥ २९ ॥ तीनमें अब मैं पार्थ । सात्विक तुझे प्रस्तुत । करता हो दत्त चित्त । सुन तू इसे ॥ ६३० ॥ मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः । सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्विक उच्यते ॥ २६ ॥ निःसंग निरहंकारी उत्साही धैर्यसे भरा । फले जले अविकारी कर्ता सात्विक है कहा ॥ २६ ॥ ७६५ सर्व गीतार्थ संग्रह, ईश्वर प्रसाद ग्रोग