ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 992, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंपहले गणमें ( १ ) चित्रज्योतिस् ( २ ) चैत्य ( ३ ) ज्योतिष्मान् ( ४ ) शक्रज्योति ( ५ ) सत्य ( ६ ) सत्यज्योतिस् ( ७ ) सुतपस् । दूसरे गणमें-( १ ) अमित्र ( २ ) ऋतजित् ( ३ ) सत्यजित् ( ४ ) सुतमित्र ( ५ ) सुरमित्र ( ६ ) सुषेण ( ७ ) सेनजित् । तीसरे गणमें-( १ ) उग्र ( २ ) धनद ( ३ ) धातु ( ४ ) भीम ( ५ ) वरुण । और दो नाम नहीं मिले । चौथे गणमें-( १ ) अभियुक्तशिक्र ( २ ) साह्य । और नाम नहीं मिले । पांचवे गणमें-( १ ) अन्यादृश ( २ ) ईंदृश ( ३ ) तुम ( ४ ) मित ( ५ ) वृक्ष ( ६ ) समित् ( ७ ) सरित् । छठे गणमें-( १ ) ईदृश् ( २ ) नाभ्यादृश् ( ३ ) पुरुष ( ४ ) प्रतिहर्त्तृ ( ५ ) समचेतन ( ६ ) समवृत्ति ( ७ ) संमिति । सातवे गणके-नाम नहीं मिले । प्रत्येक गणमें सात मरुत् होने चाहिए । किंतु कुछ नाम नहीं मिलते । पहला गण पृथ्वीसे मेघ तक, दूसरा मेघसे सूर्य तक, तीसरा सूर्यसे सोमके निम्न भाग तक, चौथा सोमके ऊपर नक्षत्रों तक, पांचवा नक्षत्रोंके ऊपरसे ग्रहों तक, छठा ग्रहोंके ऊपरसे ऋषियों तक, सातवा ऋषियोंसे ध्रुव तक भ्रमण करते हैं । इनके अधिकार स्थान पृथ्वी, सूर्य, सोम, ज्योतिर्गण, ग्रह, सप्त ऋषि मंडल, ध्रुव है । इनका रथ हरिण खींचते हैं । ये जब वेगसे दौडते हैं तब पर्वत कांपते हैं। वृक्ष जड-मूलसे उखड पडते हैं । सारा विश्व डांवाडोल होता है । इनके हाथमें धनुष्य बाण और भाला होता है । वज्र और सोनेकी कुल्हाडी होती है । ये इंद्रके मित्र हैं । वर्षा गिराना इनका मुख्य कार्य है ये कुल ४९ हैं । वेदादिका सारा वर्णन देखनेसे लगता है कि आंधी बवंडर आदिका इनसे गहरा संबंध है । इनका पिता रुद्र और माता पृश्नी है । कहीं कहीं ये दिति और कश्यपके पुत्र माने गये हैं । पुराणोंमें इन्हे "वायुके सात प्रवाहोंमें संचार करनेवाले दिति-पुत्र" कहा गया है । इन सात प्रकारके वायुमंडलोंकी ( १ ) आवह-पृथ्वीसे मेघमंडल तक (२) प्रवह - मेघ- मंडलसे सूर्यमंडल तक ( ३ ) उद्वह - चंद्र और सूर्यमंडल तक ( ४ ) संवह - चंद्रमंडलसे नक्षत्र- मंडल तक ( ५ ) विवह - नक्षत्रमंडलोंमें- ( ६ ) परिवह - शनिमंडलसे सप्तऋषि मंडल तक ( ७ ) परावह - ऋषिमंडलसे ध्रुव तक कार्य सीमा है । मरीचि - विशेष जानकारी नहीं मिली । गीता अ० १०, श्लो० २१-नक्षत्रोंमें शशांक मैं- आकाशके पूर्व-पश्चिम परिवर्त्तमें जो तारा पुंज झिलमिलाता है उन्हे नक्षत्र कहते हैं । पाणिनीने "जो क्षति नहीं होता" उसे नक्षत्र कहा है। वेदोंमें नक्षत्रोंकी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष चर्चा है । कहीं कहीं क्षीरसागरके मंथनके समय चंद्रोत्पत्ति होते हुए जो सागर तुषार उछले या छलके उससे नक्षत्र बने ऐसा काव्यमय वर्णन है । तो कहीं नक्षत्रोंको सूर्यकी चिनगारी माना गया है । ज्ञानेश्वरी ५३