दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ९७ मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु । तुलसी तीनिउ तब फबैं जौ चातक मत लेहु ॥२८५॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि आत्मसम्मानकी रक्षा करना, माँगना और फिर भी प्रियतमसे प्रेमका नित्य नवीन होना (बढ़ना)—ये तीनों बातें तभी शोभा देती हैं जब चातकके मतका अनुसरण किया जाय ॥ २८५ ॥ तुलसी चातक ही फबै मान राखिबो प्रेम । बक्र बूंद लखि स्वातिहु निदरि निबाहत नेम ॥२८६॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं, प्रेमके मानकी रक्षा करना और प्रेमको भी निबाहना चातकहीको शोभा देता है। स्वाती नक्षत्र- में भी यदि बूंद [मेघकी ओर निहारते हुए उसके मुखमें सीधी न पड़कर] टेढ़ी पड़ती है तो वह उसका निरादर करके प्रेमके नियमको निबाहता है (चोंचको टेढ़ी करनेमें दूसरी ओर ताकना हो जायगा और इससे उसके प्रेममें व्यभिचार होगा, इसलिये वह प्यासा रह जाता है, परंतु मुँह टेढ़ा नहीं करता । दूसरी बात यह है कि वह टेढ़ी चोंच करके पीता है तो उसका मान घटता है, वह माँगता नहीं है, प्रेमी है; देना हो तो सीधे दो, नहीं तो न सही) ॥ २८६ ॥ तुलसी चातक माँगन्यो एक एक घन दानि । देत जो भू भाजन भरत लेत जो घूंटक पानि ॥२८७॥ भावार्थ—तुलसीदासजी कहते हैं कि चातक एक ही (अद्वितीय) माँगनेवाला है और बादल भी एक ही (अद्वितीय) दानी है। बादल इतना देता है कि पृथ्वीके सब बर्तन (झील, तालाब आदि) भर जाते हैं; परंतु चातक केवल एक घूंट ही पानी लेता है ॥२८७॥ दोहा० ७-८—