दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ७९ भावार्थ—श्रीरामजीके दूत वायुपुत्र श्रीहनुमान्जी मनोहर मङ्गल और आनन्दकी मूर्ति हैं। उनका स्मरण करते ही समस्त सिद्धियाँ करतलगत (सुलभ) हो जाती हैं ॥ २२९ ॥ धीर बीर रघुबीर प्रिय सुमिरि समीर कुमारु । अगम सुगम सब काज करु करतल सिद्धि बिचारु ॥२३०॥ भावार्थ—धीर, वीर श्रीरघुवीरके प्यारे पवनकुमार श्रीहनुमान्- जीका स्मरण करके चाहे जैसे दुर्लभ या सुलभ सब काम करो; निश्चय रक्खो कि उनकी सफलता तुम्हारे हाथमें ही रक्खी है ॥२३०॥ सुख मुद मंगल कुमुद बिधु सुगुन सरोरुह भानु । करहु काज सब सिद्धि सुभ आनि हिएँ हनुमान ॥२३१॥ भावार्थ—सुख, आनन्द और मङ्गलरूपी कुमुदिनीके खिलानेके लिये चन्द्रमाके सदृश और सुन्दर गुणरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिये सूर्यके समान श्रीहनुमानजीका हृदयमें ध्यान करके कार्य आरम्भ करो; फिर सब शुभ और सिद्ध ही होगा ॥ २३१ ॥ सकल काज सुभ समउ भल सगुन सुमंगल जानु । कीरति बिजय बिभूति भलि हियँ हनुमानहि आनु ॥२३२॥ भावार्थ—श्रीहनुमानजीका हृदयमें ध्यान करो और यह निश्चय समझ लो कि तुम्हारे सभी कार्य शुभ होंगे, दिन अच्छे आवेंगे, सभी सद्गुण, सुमङ्गल, कीर्ति, विजय और विमल विभूतिकी प्राप्ति होगी ॥ २३२ ॥ सूर सिरोमनि साहसी सुमति समीर कुमार । सुमिरत सब सुख संपदा मुद मंगल दातार ॥२३३॥ भावार्थ—शूरोंके शिरोमणि, साहसी, सुबुद्धिमान् श्रीपवनकुमार