दोहावली (गोस्वामी तुलसीदास - गीताप्रेस सम्पूर्ण ५७३ दोहे सान्वय सटीक)
Dohavali of Goswami Tulsidas with Gita Press Commentary
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदोहावली ९१ दम्भका बल है, कामके केवल कामिनीका बल है और क्रोधके कठोर वचनका बल है ॥२६५॥ मोहकी सेना काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि । तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ॥२६६॥ भावार्थ-काम, क्रोध, मद और लोभ आदि मोहकी प्रबल सेना है। इनमें स्त्री जो माया की साक्षात् मूर्ति है, वह तो बहुत ही भया- नक दुःख देनेवाली है ॥२६६॥ अग्नि, समुद्र, प्रबल स्त्री और कालकी समानता काह न पावक जारि सक का न समुद्र समाइ । का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥२६७॥ भावार्थ—अग्नि क्या नहीं जला सकती ? समुद्रमें कौन वस्तु नहीं डूब सकती, प्रबल होनेपर अबला कहलानेवाली स्त्री क्या नहीं कर सकती ? और जगत्में काल किसको नहीं खाता ? ॥२६७॥ स्त्री झगड़े और मृत्युकी जड़ है. जनमपत्रिका बरति कै देखहु मनहिँ बिचारि । दारुन बैरी मीचु के बीच बिराजति नारि ॥२६८॥ भावार्थ-जन्मकुण्डलीको व्यवहारमें लाकर मनमें विचारकर देखो कि स्त्री भयंकर बैरीके और मृत्युके बीचके स्थानमें विराज रही है (कुण्डलीके बाहर स्थानोंमें छठा शत्रु का और आठवां मृत्युका माना जाता है। इनके बीचमें स्त्रीका स्थान सातवाँ है। जगत्में स्त्रियोंके कारण न मालूम कितने लोगोंमें शत्रुता और कितनोंकी मृत्यु हुई है।) ॥२६८॥