भारतकोश
दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Drig Drishya Viveka Hindi

स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished34 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 34 में से

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दृग्दृश्य विवेक Drig Drishya Vivek


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साक्षिणः पुरतो भाति लिंगं देहेन संयुतम्। चितिच्छायासमावेशात् जीवः स्याद् व्यावहारिकः।।

जीव शब्द उस (मन के अन्तर्गत विद्यमान) व्यवहार करने वाले कर्ता के लिये प्रयुक्त होता है, जो साक्षी के अत्यन्त निकट होता है, तथा जो चेतनता की छाया से युक्त होने के कारण ही जीवन्त होता है।

The subtle body which exists in close proximity to the Witness identifying itself with gross body becomes the embodied empirical self, on account of its being affected by the reflection of Consciousness


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