दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Drig Drishya Viveka Hindi
स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)
DevanagariHindipublished34 पृष्ठ
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दृग्दृश्य विवेक | Drig Drishya Vivek
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उपेक्ष्य नामरूपे द्वे
सच्चिदानन्दतत्परः।
समाधिं सर्वदा कुर्याद्
हृदये वाऽथवा बहिः॥
जगत् शब्द से लक्षित 'नाम और रूपों' की उपेक्षा करके, अपने मन में अथवा बाह्य जगत् में सच्चिदानन्द स्वरूप ब्रह्म को ही सर्वत्र देखते हुए उसी में चित्त को समाहित करने का सतत प्रयास करना चाहिये।
Having become indifferent to name and form and being devoted to Sac-chid-ananda aspects, one should always practice samadhi either within the heart or outside.
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