भारतकोश
दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

दृग्-दृश्य विवेक (स्वामी भारतीतीर्थ - सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Drig Drishya Viveka Hindi

स्वामी भारतीतीर्थ / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Drig-Drishya Viveka with Sanskrit Shlokas and Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished34 पृष्ठ

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दृग्दृश्य विवेक | Drig Drishya Vivek


रूपं दृश्यं लोचनं दृक्
तद्दृश्यं दृक्तु मानसम्।
दृश्याः धीवृत्तयस्साक्षी
दृगेव न तु दृश्यते।।

रूप दृश्य है और नेत्र दृष्टा। ये नेत्र-दृष्टा भी मन की दृष्टि से दृश्य की श्रेणी में आ जाते हैं। मन शब्द से लक्षित सभी वृत्तियाँ भी साक्षी की दृष्टि से दृश्य हैं। यह साक्षी किसी के द्वारा दृश्य नहीं बनता है, अतः वह ही वास्तविक दृष्टा है।

The form is perceived and the eye is its perceiver. The eye is perceived and the mind its perceiver. The mind with its modifications is perceived and the witness is verily the perceiver, but it is not perceived.


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