गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । ( ११३ ) हेतुरहित, असत्य, तथा देह और आत्माको एक मानना, क्रूर और थोडे अर्थयुक्त विषयोंमें लगना इस ज्ञानका नाम तामसी है ॥ १३ ॥ भेदतस्त्रिविधं कर्म विद्धि राजन्मयेरितम् ॥ कामनाद्वेषदम्भैर्यद्रहितं नित्यकर्म यत् ॥ १४ ॥ हे राजन् ! सत्,रज,तम इन भेदोंसे कर्म भी तीन प्रकारका है कामना,द्वेष और दंभरहित जो नित्य कर्म है ॥ १४ ॥ कृतं विना फलेच्छां यत्कर्म सात्त्विकमुच्यते ॥ यद्बहुक्लेशतः कर्म कृतं यच्च फलेच्छया ॥ १५ ॥ और फलकी इच्छा रहित जो कर्म किया जाता है, वह सात्त्विक कहाता है और जो बहुत क्लेश तथा फलकी इच्छासे किया है ॥ १५ ॥ क्रियमाणं नृभिर्दम्भात्कर्म राजसमुच्यते ॥ अनपेक्ष्य स्वशक्तिं यदर्थक्षयकरं च यत् ॥ १६ ॥ और जिसको मनुष्य दंभपूर्वक करते हैं वह राजसी कर्म कहाता है और जो अपनी शक्तिके बाहर तथा अर्थका क्षय करनेहारा कर्म किया जाता है ॥ १६ ॥