गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) गणेशगीता अ० ३ । जनाः स्युरितरे राजन्मम मार्गानुयायिनः ॥ तथैव व्यवहारं ते स्वेषु चान्येषु कुर्वते ॥ १६ ॥ हे राजन् ! जिस प्रकारसे दूसरे लोग भी मेरे अनुयायी होजाँय, इसी प्रकारका व्यवहार वे अपने तथा दूसरे मनुष्योंमें करते हैं ॥ १६ ॥ कुर्वन्ति देवताप्रीतिं कांक्षन्तः कर्मणां फलम् ॥ प्राप्नुवन्तीह ते लोके शीघ्रं सिद्धिं हि कर्मजाम् १७ और जो कर्मोंके फल प्राप्त होनेकी इच्छासे देवताओंकी उपासना करते हैं, उन उन कर्मोंके अनुसार उनको शीघ्र सिद्धि प्राप्त होती है ॥ १७ ॥ चत्वारो हि मया वर्णा रजःसत्त्वतमोंऽशतः ॥ कर्मांशतश्च संसृष्टा मृत्युलोके मयाऽनघ ॥१८॥ हे पापरहित ! मृत्युलोकमें मैंने चारों वर्णोंको सत्त्व रज तम इन गुणोंसे और कर्मोंके अंशसे उत्पन्न किया है ॥१८ ॥ कर्त्तारमपि तेषां मामकर्त्तारं विदुर्बुधाः ॥ अनादिमीश्वरं नित्यमलिप्तं कर्मजैर्गुणैः ॥१९॥ यद्यपि मैं इनका कर्ता हूं परन्तु पंडित जन मुझे अकर्ता जानते हैं अनादि, ईश्वर, नित्य और कर्मोंके गुणोंसे अलिप्त मानते हैं ॥ १९ ॥