गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासमेत । (६१) हे राजन् ! जिस प्रकार अपने वशमें करे सिंहादि मृगोंको तथा लोकोंको पीडा नहीं देते हैं, इसी प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थित होकर पापोंको भस्म करता है, परन्तु शरीरको नहीं जलाता ॥ ३१ ॥ यथायथा नरः कश्चित्सोपानावलिमाक्रमेत् ॥ तथातथा वशीकुर्यात्प्राणापानौ हि योगवित् ३२ जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य चढनेकी सीढियोंको अतिक्र- मण करता है, इसी प्रकार क्रमसे प्राणापानको वशमें करना उचित है ॥ ३२ ॥ पूरकं कुम्भकं चैव रेचकं च ततोऽभ्यसेत् ॥ अतीतानागतज्ञानी ततः स्याज्जगतीतले ॥३३॥ पूरक कुंभक और रेचकका अभ्यास करके यह प्राणी इस जगतमें भूत भविष्य वर्तमान तीनों कालका ज्ञाता हो जाताहै ३३ प्राणायामैर्द्वादशभिरुत्तमैर्धारणा मता ॥ योगस्तु धारणे द्वेस्याद्योगीशस्ते सदाभ्यसेत् ३४ १ पूरक-वायुको ऊपर खेचना, कुंभक-वायुका रोध करना । रेचक-वायुका त्याग करना यह तीन नाड़ी हैं।