भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ६४ ) गणेशगीता-अ० ५. इन्द्रियोंके निमित्त संकल्प कर कर्म करनेवाला अपना शत्रु होता है, और जो इनकी इच्छा न कर कर्म करता है वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ सुहृत्त्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बंधने ॥ आत्मनैवात्मनो ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन ४ एकमात्र आत्माही आत्माका मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है, और यही अज्ञान होनेसे बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ४ ॥ मानेऽपमाने दुःखे च सुखे सुहृदि साधुषु ॥ मित्रेऽमित्रेऽप्युदासीने द्वेष्ये लोष्टे च काञ्चने।५॥ मान, अपमान, सुख, दुःख, साधु, आप्त, मित्र, अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मट्टीका ढेला और सुवर्ण इत्यादिमें ॥ ५ ॥ समो जितात्मा विज्ञानी ज्ञानींद्रियजयावहः ॥ अभ्यसेत्सततं योगं यदा युक्ततमो हि सः ॥६॥ समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी, जितात्मा, सदा योगका अभ्यास करता रहे. जब तक उसको योगकी प्राप्ति हो ॥ ६ ॥