गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) गणेशगीता-अ० ६. जल सागरमें जाता है, ऐसे ही सब देवताओंकी आराधना मुझमें प्राप्त होती है ॥ १८ ॥ ब्रह्मविष्णुशिवेन्द्राद्याँल्लोकान्प्राप्य पुनः पतेत् ॥ यो मामुपैत्य संदिग्धः पतनं तस्य न क्वचित् १९ ब्रह्मा विष्णु शिव इन्द्रादि लोकोंको प्राप्त होकर यह फिर फिर संसारमें प्राप्त होता है, जो असंदिग्ध होकर मुझको प्राप्त होता है उसका फिर जन्म नहीं होता ॥ १९ ॥ अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप ॥ योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥२०॥ हे राजन् ! जो अनन्य शरण होकर भक्तिसे मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योग क्षेम ( मंगल ) का विधान करता हूं ॥ २० ॥ विविधा गतिरुद्दिष्टा शुक्ला कृष्णा नृणां नृप ॥ एकया परं ब्रह्म परया याति संसृतिम् ॥२१॥ ॐ तत्सदिति श्रीमद्गणेशगीतासूपनिषदर्थगर्भासु योगा- मृतार्थशास्त्रे श्रीमन्महागणेशपु० उत्तरखण्डे श्रीगजानन- वरेण्यसंवादे बुद्धियोगो नाम षष्ठोऽध्यायः ॥ ६ ॥