गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)
Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary
भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७८ ) गणेशगीता-अ० ७. पक्ष अभिमानी देवता, चंद्र और ज्योति अभिमानी देवता, षण्मासाभिमानी देवताको आश्रय करके जो गमन करते हैं, वह कृष्णागति कहाती है ॥ २ ॥ कृष्णेते ब्रह्मसंसृत्योरवाप्तेः कारणं गती ॥ दृश्यादृश्यमिदं सर्वं ब्रह्मैवेत्यवधारय ॥ ३ ॥ इन्हीं दोनों गतियोंसे ब्रह्म और संसारकी प्राप्ति होती है, जो कुछ यह दृश्य और अदृश्य है, तुम इस सबको ब्रह्म जानो ३॥ क्षरं पञ्चात्मकं विद्धि तदन्तरक्षरं स्मृतम् ॥ उभाभ्यां यदतिक्रान्तं शुद्धं विद्धि सनातनम्४॥ पंचमहाभूतोंको क्षर कहते हैं, उसके अनन्तर अक्षर है, इन दोनोंको अतिक्रमणकर शुद्ध सनातन ब्रह्मको जानो ॥ ४ ॥ अनेकजन्मसंभूतिः संसृतिः परिकीर्तिता ॥ संसृतिं प्राप्नुवन्त्येते ये तु मां गणयन्ति न ॥ ५ ॥ अनेक जन्मोंकी संभूति ( ऐश्वर्य ) को आवागमन कहते हैं इस संसृतिको वे प्राप्त होते हैं जो मुझे नहीं गिन्ते ॥ ५ ॥ ये मां सम्यगुपासन्ते परं ब्रह्म प्रयान्ति ते ॥ ध्यानाद्यैरुपचारैर्मां तथा पञ्चामृतादिभिः ॥६॥