भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रथमेश्वरः—मुख्य देवता—ब्रह्मा, विष्णु और शिवके | २०७. उन्नतप्रपदः—जिनके पैरोंका अग्रभाग भी ईश्वर ॥ ३३ ॥ | कूर्मपीठके समान ऊँचा है, वे; २०८. गूढगुल्फः— १९१. चिन्तामणिद्वीपपतिः—चिन्तामणि नामक | जिनके गुल्फ (टखने) मांससे छिपे हुए हैं, वे; २०९. द्वीपके स्वामी; १९२. कल्पद्रुमवनालयः—कल्पवृक्षोंके | संवृतपाष्णिंकः—जिनके टखनेके नीचेका भाग भी वनमें वास करनेवाले; १९३. रत्नमण्डपमध्यस्थः— | मांसल है, वे; २१०. पीनजङ्घः—पीन (मांसल) रत्नमय मण्डपके मध्यमें विराजमान; १९४. रत्न- | पिंडलियोंवाले; २११. श्लिष्टजानुः—जिनके दोनों सिंहासनाश्रयः—रत्नसिंहासनपर आसीन ॥ ३४ ॥ | घुटने स्पष्ट नहीं दिखायी देते, वे; २१२. स्थूलोरुः— १९५. तीव्रा१शिरोधृतपदः—तीव्रा नामक | मोटी जाँघवाले; २१३. प्रोन्नमत्कटिः—ऊँचे कटि- पीठशक्तिने जिनके चरणोंको अपने मस्तकपर धारण कर | प्रदेशवाले ॥ ३८ ॥ रखा है, वे भगवान् गणेश; १९६. ज्वालिनी- | २१४. निम्ननाभिः—गहरी नाभिवाले; २१५. मौलिलालितः—ज्वालिनी नामक शक्ति अपने मुकुटसे | स्थूलकुक्षिः—लम्बोदर; २१६. पीनवक्षाः—ऊँची जिनके चरणोंका स्पर्श करके लाड़ लड़ाती है, वे; १९७. | छातीवाले; २१७. बृहद्भुजः—बड़ी बाँहवाले; २१८. नन्दानन्दितपीठश्रीः—नन्दा नामक शक्ति जिनके पीठकी | पीनस्कन्धः—मांसल कन्धेवाले; २१९. कम्बुकण्ठः— शोभाका अभिनन्दन करती है, वे; १९८. भोगदा- | त्रिवलीयुक्त शंखाकार ग्रीवावाले; २२०. लम्बोष्ठः— भूषितासनः—जिनका सिंहासन भोगदा नामक पीठशक्तिसे | लटकते हुए ओठोंवाले; २२१. लम्बनासिकः—लम्बी विभूषित है, वे ॥ ३५ ॥ | नासिका (सूँड़)-वाले ॥ ३९ ॥ १९९. सकामदायिनीपीठः—जिनका पीठ | २२२. भग्नवामरदः—जिनके बायें दाँतका अग्रभाग कामदायिनीशक्तिसे समलंकृत है, वे; २००. | टूट गया है, वे; २२३. तुङ्गसव्यदन्तः—जिनका दाहिना स्फुरदुग्रासनाश्रयः—तेजस्विनी उग्रा-शक्तिसे सुशोभित | दाँत ऊँचा है, वे; २२४. महाहनुः—लम्बी ठोढ़ीवाले; आसनपर बैठनेवाले; २०१. तेजोवतीशिरोरत्नं—तेजोवती | २२५. ह्रस्वनेत्रत्रयः—छोटे-छोटे तीन नेत्रोंवाले; २२६. नामक शक्तिके सिरके मणिरत्न; २०२. सत्यानित्या- | शूर्पकर्णः—सूपके समान विशाल कानवाले; २२७. वतंसितः—सत्या नामक शक्ति जिन्हें नित्य अपने | निबिडमस्तकः—घनीभूत कठोर मस्तकवाले ॥ ४० ॥ मस्तकका आभूषण बनाये रखती है, वे ॥ ३६ ॥ | २२८. स्तबकाकारकुम्भाग्रः—जिनके कुम्भस्थल २०३. सविघ्ननाशिनीपीठः—विघ्ननाशिनी नामक | (मस्तक)-का अग्रभाग गुच्छके समान दिखायी देता है, शक्तिसे सुशोभित पीठवाले; २०४. सर्वशक्त्यम्बु- | वे; २२९. रत्नमौलिः—रत्नमय मुकुटसे मण्डित; २३०. जाश्रयः—सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त कमलके आसनपर | निरङ्कुशः—जिनके कुम्भस्थलपर कभी अंकुशका स्पर्श विराजमान; २०५. लिपिद्मासनाधारः२—अक्षरोंसे युक्त | नहीं होता, वे; अथवा परम स्वतन्त्र; २३१. कमल (मातृकापद्म)-के आसनपर बैठनेवाले; २०६. | सर्पहारकटीसूत्रः—जो सर्पाकार हार और कटिसूत्र वह्निधामत्रयाश्रयः—कमलकी कर्णिकाके ऊपर | (मेखला) धारण करते हैं, वे; २३२. सर्पयज्ञो- विराजमान सूर्य, चन्द्र और अग्निसंज्ञक त्रिविध तेजोमण्डलमें | पवीतवान्—सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले ॥ ४१ ॥ स्थित ॥ ३७ ॥ | २३३. सर्पकोटीरकटकः—मुकुट और वलयके ───────────────────────────────────────────────────────────────────────────── १. तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामदायिनी, उग्रा, तेजोवती, सत्या और विघ्ननाशिनी—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं। पीठगत अष्टदल कमल और उसकी कर्णिकामें ये पूजित होती हैं। इन नौ शक्तियों और कमलके सम्बन्धसे यहाँ क्रमशः दस नाम वर्णित हुए हैं। २. अष्टदलकमलके आठ किंजल्कोंमें क्रमशः दो-दो स्वर, आठ दलोंमें क्रमशः क, च, ट, त, प, य, श—इन आठ वर्गोंको तथा कर्णिकामें प्रसादको अंकित करनेपर उसे 'लिपिद्म' या 'मातृकापद्म' कहते हैं। (खद्योतभाष्य) Kalyana Visheshank 2021_Section_6_1_Front