श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०११ ] * महर्षि कश्यपजीद्वारा इन्द्रको बालक गणेशके अद्भुत कर्मोंको बताना * २९३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] आप सभी लोगोंके देखते-देखते इसने विघात आदि पाँच राक्षसोंको मार डाला। महर्षि कश्यपजीके इस प्रकारके वचन सुनकर बल नामक राक्षस तथा वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र बोले— ॥ ८ ॥ इन्द्र बोले— जबतक मैं इसके गुणोंके वैशिष्ट्यको नहीं देख लेता, तबतक यह मेरे लिये कैसे मान्य हो सकता है ? ॥ ८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले— तदनन्तर देवराज इन्द्रने वायुदेवताको आज्ञा दी कि इस बालकको उड़ाकर आकाशमें ले चलो ॥ ९ ॥ इन्द्रकी आज्ञा प्राप्त करते ही वायुदेव प्रलयकालमें प्रवाहित होनेवाली आँधीके समान वेगसे प्रवहमान हो गये, वे सभी लोकोंको आन्दोलित करने लगे, पृथ्वीको धारण करनेवाले पर्वतोंको जोरसे घुमाने लगे, कहीं असमयमें ही प्रलय तो नहीं शुरू हो गया, इस प्रकारसे विचार करते हुए अत्यन्त भयभीत ऋषिगण काँप उठे ॥ १०-११ ॥ तदनन्तर वायुदेवता उस बटुक गणेशको उड़ा ले जानेके लिये बड़े वेगसे उसके पास पहुँचे, परंतु न तो उस बालकका आसन हिला और न एक रोम ही हिल सका। वायुदेव जब अपने प्रयत्नमें विफल हो गये, तब इन्द्रने अग्निसे कहा— तुम शीघ्र ही इस बटुकको जला डालो, आज तुम्हें अपनी सामर्थ्यका प्रदर्शन करना होगा ॥ १२-१३ ॥ इन्द्रकी आज्ञाको शिरोधार्य करके वे अग्निदेव प्रलयकालीन अग्निके समान देदीप्यमान होकर तीनों लोकोंको जलाते हुए-से उस बालकके पास पहुँचे ॥ १४ ॥ सभी वृक्षोंको जला डालते हुए, सभी समुद्रोंको सुखाते हुए और सभी लोगोंको जलाते हुए उन अग्निको देखकर महर्षि कश्यपजीके पुत्र बालक गणेशने अग्निको तत्काल वैसे ही निगल लिया, जैसे कोई रोगी औषधिकी गोलीको निगल जाता है ॥ १५१/२ ॥ अग्निको इस प्रकारसे निगल लिये जानेपर वे इन्द्र क्रोधसे लाल आँखोंवाले हो गये और वे हजार आँखोंवाले इन्द्र अपनी सब कुछ देख सकनेवाली सभी आँखोंसे लोगोंको देखने लगे ॥ १६१/२ ॥
[दायाँ स्तम्भ] उसी समय इन्द्रने देखा कि वह बालक गणेश हजारसे भी अधिक आँखोंवाला हो गया है। उसके असंख्य सिर और असंख्य मुकुट हैं, उसके कानोंकी संख्या अनन्त है, वह अनन्त हाथ, पैरोंवाला है, अन्तहीन उत्कृष्ट पराक्रमसे सम्पन्न है, सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि— ये उसके तीन नेत्र हैं, उसने अपने शिरोमण्डलसे आकाश तथा पृथ्वीको व्याप्त कर रखा है, सात पाताल ही उसके चरण हैं, सातों लोक उसके एक मस्तकके समान हैं, असंख्यों सूर्योंके समान उसकी आभा है, असंख्य इन्द्र उसकी सेवा कर रहे हैं, वह असंख्य विष्णु, ब्रह्मा, शिव आदिसे समन्वित है, उसके एक-एक रोममें अनेकों ब्रह्माण्ड स्थित हैं, जिस प्रकार गूलरके वृक्षमें जड़से लेकर सिरेतक गूलरके फल-ही-फल लगे रहते हैं अथवा जैसे गूलरके फलमें असंख्य मात्रामें मच्छर भिनभिनाते रहते हैं, वैसे ही उसके एक-एक रोमकूपमें असंख्य ब्रह्माण्ड स्थित थे ॥ १७-२११/२ ॥ भ्रान्त होकर उन अनेक ब्रह्माण्डोंमेंसे एक ब्रह्माण्डके भीतर इन्द्र प्रविष्ट हो गये तो वहाँ उन्होंने चराचर जगत्सहित तीनों लोकोंको देखा। जैसे वनमें उगनेवाले केलेके कोशके प्रत्येक पत्रमें फल लगे रहते हैं, वैसे ही शचीपति इन्द्रने वहाँ एक ब्रह्माण्डके अन्तर्गत असंख्य जगत् देखे ॥ २२-२३१/२ ॥ भ्रान्तचित्त होकर वे उसीके अन्दर चक्कर काटने लगे, लेकिन उन्हें वहाँसे बाहर निकलनेका कोई मार्ग दिखायी नहीं दिया, तब विफल मनोरथवाले इन्द्रने भगवान् गणपतिको सिर झुकाकर प्रणाम किया। तदनन्तर उन्होंने देवदेवेश्वर गजाननकी प्रार्थना की ॥ २४-२५ ॥ इन्द्र बोले— जो महर्षि कश्यपके पुत्ररूपमें पृथ्वीके भारका हरण करनेके लिये अवतरित हुए हैं और जिनकी महिमाका आकलन ही नहीं हो सकता, फिर मेरे द्वारा उनकी महिमाका कैसे वर्णन किया जा सकता है ? ॥ २६ ॥ हे देवेश्वर! आप अत्यन्त विस्तारवाली कुक्षिसे मुझे बाहर निकलनेका मार्ग प्रदान कीजिये। यहाँ घूमते हुए मुझे बारह वर्ष व्यतीत हो गये हैं, किंतु मैं इससे पार पानेका मार्ग नहीं देख पा रहा हूँ ॥ २७ ॥