भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 656 में से

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क्री०ख०-अ०१९ ] * विनायककी बाललीलाके प्रसंग * ३१५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 किस प्रकार हरण कर लिये ? ऐसा कहकर उन सभीने | अनेक वस्तुएँ समर्पित कीं ॥ ५३॥ बालक विनायकका पूजन किया, उन्हें प्रणाम किया, | तदनन्तर राजाने नागरिकोंका सम्मानकर उन्हें विदाकर उनकी स्तुति की और वे उनकी प्रशंसा करने लगे ॥ ५२॥ | सभाका विसर्जन किया। बालक विनायक भी पहलेके कमललोचन काशिराजने ब्राह्मणोंको विविध दान | समान ही सामान्य बालक बनकर अन्य बालकोंके साथ दिये और अन्य द्विजों, चारणों, बन्दीजनों तथा दीनोंको | खेलने चले गये ॥ ५४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें बालचरितके अन्तर्गत 'कपटी दैत्यके वधका वर्णन' नामक अठारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १८॥ उन्नीसवाँ अध्याय विनायककी बाललीलाके प्रसंगमें दैत्य नरान्तकद्वारा दो दैत्यों कूप तथा कन्दरको काशीनगरीमें भेजना, कूपका कुआँ और मेढक बनकर तथा कन्दरका बालक बनकर विनायकको मारनेका प्रयत्न करना, विनायकद्वारा लीलापूर्वक दोनोंका परस्पर वध कराना ब्रह्माजी बोले-महादैत्य नरान्तकने बालक | कूप नामक असुरने काशिराजके आँगनमें एक विशाल विनायकके द्वारा ब्राह्मणका वेष धारण किये हुए | कुएँका रूप धारण कर लिया और कन्दर नामक असुर ज्योतिषी असुरके वधका समाचार सुनकर कूपक नामक | छोटा बालक बन गया और बालकोंके साथ खेलनेकी असुर तथा ब्रह्माके द्वारा वर प्राप्त किये हुए पराक्रमी | इच्छा करने लगा ॥ ७-८॥ कन्दरासुरको बहुत-से वस्त्र तथा विविध प्रकारके | काशिराजने जब अत्यन्त निर्मल जलवाले उस रत्नोंकी भेंट देकर काशिराजके नगरमें भेजा ॥ १-२॥ | कुएँको देखा तो वे बड़े प्रसन्न हो गये। फिर उन्होंने दैत्य नरान्तक बोला-तुम दोनों शीघ्र ही शुभ | कुएँके अन्दर झाँका तो उन्हें वहाँ एक मेढक दिखायी मुहूर्तमें उस बालक विनायकके वधके लिये जाओ। | दिया। वह मेढक सुन्दर वाणीमें ध्वनि कर रहा था। उसके द्वारा विविध उपायोंसे मारे गये असुरोंका तुम लोग | उसका वर्ण पीला था और वह देखनेमें अत्यन्त भयानक बलपूर्वक बदला लो ॥ ३॥ | था। इधर बालकोंके बीचमें स्थित, बालक बने कन्दर ब्रह्माजी बोले- इस प्रकार उससे आज्ञाप्राप्त वे | नामक असुरने उन विनायकसे कहा- ॥ ९-१०॥ दोनों कूप और कन्दर नामक असुर चतुरंगिणी सेना | हे महाबाहो ! बाहर चलो, और उस सुन्दर कुएँको लेकर दो कोशकी दूरीपर चले गये ॥ ४ ॥ | देखो। तब उसी समय उन्होंने बालकोंके साथ बाहर पुनः वहाँसे सेनाको लौटाकर बड़ी प्रसन्नताके साथ | आकर उस कुएँको देखा। उस अत्यन्त रमणीय कुएँको वे आगे बढ़े। दोनों मार्गमें विचार करने लगे, तदनन्तर | देखकर बालक विनायक अन्य बालकोंके साथ विविध कूपने कन्दरसे कहा- 'मैं कुआँ बन जाऊँगा और तुम | भावोंके प्रदर्शनका खेल तथा छुपने और पकड़नेका खेल बालक बन जाना, तब तुम खेलते-खेलते उस विनायकको | खेलने लगे ॥ ११-१२ ॥ प्रयत्न करके मेरे अन्दर अर्थात् कुएँमें ढकेल देना। मैं | मध्याह्नकालमें वे सभी बालक जलके अन्दर मेढक बनकर तत्क्षण ही उसे खा जाऊँगा ॥ ५-६॥ | उतरकर आपसमें जल-फेंकनेकी क्रीडा करने लगे, फिर इस बहुत बड़े कार्यको करके हम दोनों अन्तर्धान | वे जलमें डुबकी लगाने, फिर बाहर निकलने तथा हो जायँगे।' इस प्रकारका मनमें निश्चय करके वे | दूसरेको डुबकी लगवाने और बाहर निकालनेका खेल काशिराजके महान् नगर काशीमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर | खेलने लगे ॥ १३ ॥