श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 376, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
कथाको सुनो, जिसे सुनकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो | आज्ञाका पालन करनेवाली थी ॥ २०-२१ ॥ जाता है ॥ १३ ॥ | राजा दिवोदास आचार, व्यवहार अथवा प्रायश्चित्त- प्राचीन कालकी बात है, सूर्यवंशमें दिवोदास | सम्बन्धी बातोंका निर्णय पण्डितजनोंसे करवाते थे, वे नामके एक राजा हुए, जो बहुत बड़े दानी, स्वाभिमानसे | किसीको भी राजदण्ड नहीं देते थे। उस समय सभी भरे हुए, सम्पूर्ण भूमण्डलमें मान-सम्मानको प्राप्त, | देवता शंकरजीके साथ मन्दराचल-पर्वतपर चले गये थे। देवगुरु बृहस्पतिके समान वक्ता, सर्वज्ञ, सर्वदा सभीका | राजा दिवोदासके काशीमें शासन करनेपर न तो किसीकी कल्याण करनेवाले, वेद-शास्त्रों तथा पुराणोंके ज्ञाता, | अपमृत्यु होती थी, न किसीको कोई शोक ही होता था और विद्वज्जनोंके अत्यन्त प्रिय थे ॥ १४-१५ ॥ | और न किसी प्रकारका दुःख ही था ॥ २२-२३ ॥ वे अपनी सुन्दर आकृतिसे स्त्रियोंको मोहित करनेवाले | उनके द्वारा शासित राज्यमें तीनों प्रकारके उत्पात होनेपर भी जितेन्द्रिय थे। वे निरन्तर उपकार-परायण, | (दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम) नहीं होते थे। वर्षा न दूसरेसे द्रोह करनेसे दूर रहनेवाले, पराये धनकी तनिक | होनेके कारण पशु-पक्षी तथा मनुष्योंमें जो महान् भी अभिलाषा न रखनेवाले, दूरदृष्टि रखनेवाले और | हाहाकार हो रहा था, वह अब शान्त हो गया था। वर्षा अत्यन्त पराक्रमसम्पन्न थे ॥ १६ १/२ ॥ | हो जानेके कारण खेतोंमें बहुत प्रकारके सस्य (धान्यादि) उन राजा दिवोदासकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर | उत्पन्न होने लगे। उन्हीं धान्यादिपर प्राणिमात्रका जीवन लोकोंपर उपकार करनेवाले ब्रह्माजीने वृष्टि न होनेके | आधारित रहता है ॥ २४-२५ ॥ कारण अकालग्रस्त काशीपुरीका उत्तम राज्य उन्हें प्रदान | पूर्व समयमें जिस प्रकारसे स्वाहाकार, स्वधाकार किया। सभी देवताओंको बहिष्कृत करनेपर ही उन | तथा वषट्कार (अर्थात् देवपूजन, यज्ञ-यागादि, श्राद्ध बुद्धिमान् राजा दिवोदासने काशीका राज्य स्वीकार किया | तथा तर्पण आदि) होता था, वह सब फिरसे होने लगा। था ॥ १७-१९॥ | जिन देवताओंने पूर्वमें उन राजाकी प्रार्थना की थी, वे तदनन्तर राजा दिवोदास स्वयं ही सूर्य, इन्द्र, अग्नि, | सुखी हो गये। ब्रह्माजीके कथनानुसार सभी देवताओंने वायु तथा चन्द्रमा बनकर धर्मपूर्वक उस काशीपुरीका | राजा दिवोदासकी स्तुति की, उन राजा दिवोदासने भी परिपालन करने लगे। उनकी सुशीला नामकी पत्नी थी, | देवोंका दर्शन प्राप्तकर विविध प्रकारसे उनकी बहुत जो पतिव्रता, धर्माचरणपरायण, दानशील तथा पतिकी | स्तुति की ॥ २६-२७॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'दिवोदासके उपाख्यानमें' चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥
पैंतालीसवाँ अध्याय शंकरजीका सभी देवताओंको लेकर मन्दरगिरिपर जाना, राजा दिवोदासका काशीमें राज्य करना, भगवान् शिवका दिवोदासके विकार देखनेके लिये देवताओं तथा ऋषियोंको काशी भेजना, किंतु दिवोदासको निर्विकार देखकर उन सभीका काशीमें स्थित हो जाना, फलस्वरूप शिवका काशीदर्शनके लिये चिन्तित होना
कीर्ति बोली- हे मुने ! सभी देवता मन्दराचल | कृपा करें ॥ १ १/२ ॥ पर्वतपर क्यों चले गये और भगवान् शिवने उस रमणीय | मुनि गृत्समद बोले- एक बार जब बारह वर्षोंतक पुरी वाराणसीका क्यों परित्याग किया ? हे महामुने ! हे | लगातार वृष्टि नहीं हुई, तो सम्पूर्ण चराचर जगत् विनष्ट देवर्षे ! मुझे इस विषयमें संशय है, इसे आप दूर करनेकी | होने लगा, पृथ्वीपर स्वाहाकार-स्वधाकार तथा वषट्कार