श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 418, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें४१.६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम्* [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] बड़े-बड़े पहाड़ गिर जाते हैं, [उस] मुझ नरान्तकके केवल भृकुटि-विक्षेपसे ब्रह्माण्ड अत्यधिक काँपने लगता है। जिसके करतलके प्रहारसे [समूचे] भूमण्डलके दो भाग हो जाते हैं, उसके साथ तुझ बालकका संग्राम किस प्रकार हो सकेगा? जो बाघके सामने जाय, वह सुखी कैसे हो सकेगा?॥५-८॥ ब्रह्माजी बोले—नरान्तककी ऐसी बातें सुनकर वे बालरूपधारी परमात्मा विनायक कहने लगे—॥९॥ विनायक बोले—अरे मूढ़! तू किसलिये डींग हाँक रहा है। जिस पराक्रमका तू बार-बार वर्णन कर रहा है, वह उस समय कहाँ गया था, जब तेरी सम्पूर्ण सेना खायी जा रही थी॥१०॥ शूर-वीर तो शौर्य दिखलाते हैं, वे शत्रुके पराक्रमकी निन्दा करनेवाली बातें नहीं कहते और [जो तुमने यह कहा कि मैं बालक हूँ, तो ऐसी बात नहीं है,] छोटा-सा बिच्छू भी क्षणभरमें सिंहको मार डालता है। छोटा-सा दीपक भी घनघोर अँधेरेको नष्ट कर देता है और एक छोटे-से अंकुशसे मतवाला हाथी नियन्त्रित हो जाता है। [वास्तवमें] जिसकी मृत्यु निकट होती है, वह इसी प्रकार सन्निपातग्रस्तके सदृश भाषण करता है॥११-१२ १/२॥ ब्रह्माजी बोले—विनायकदेवकी ऐसी बातें सुनकर दैत्यराज अत्यधिक भयसे काँप उठा [फिर उसने अपने चित्तको सुस्थिर किया] और बादलोंके जैसी घोर गर्जना करने लगा। वह अपने गर्जनघोषसे भूमण्डलको डराता, रुलाता और कँपाता हुआ विनायकको मारनेकी इच्छासे अतिशय आवेशमें आकर वैसे ही दौड़ा, जैसे कोई पतंगा दीपककी लौको बुझानेके लिये शीघ्रतासे दौड़ने लगे॥१३-१५॥ उसकी भृकुटी तीन स्थानोंपर टेढ़ी हो गयी थी और वह मुखसे आग उगल रहा था। नरान्तकको इस प्रकारसे आते देख काशिराजने त्वरापूर्वक अपने धनुषकी प्रत्यंचा चढ़ायी और कानतक बाण खींचकर, बन्धनसे छुड़ाये गये उस निर्लज्ज दैत्यसे शान्तिपूर्वक बोले—॥१६-१७॥ दैत्येन्द्र ! प्राणोंका त्याग मत करो। जीवित रहोगे
[दायाँ स्तम्भ] तो अपना अभ्युदय देख सकोगे। तुम यहाँसे लौट जाओ, अन्यथा मारे जाओगे॥१८॥ ब्रह्माजी बोले—राजाके इन वचनोंको सुनकर क्रोधसे जलता हुआ दैत्य कहने लगा—'तुम जैसे लोगोंका भक्षण करनेके कारण ही मुझे नरान्तक कहा जाता है। यदि जीना चाहते हो तो इसी समय मेरी शरणमें आ जाओ'॥१९ १/२॥ तब राजाने मरनेकी इच्छावाले उस नरान्तकसे फिर कहा—'अरे मूढ़! विनाशकालमें बुद्धि विपरीत हो जाती है। जब समय विपरीत होता है तो मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। वरप्राप्तिके अभिमानवश तुमने अनेकों बार पापपूर्ण कृत्य किये हैं और वरदानके ही प्रभावसे तुमने वज्रको भी कुछ नहीं समझा॥२०-२२॥ इस समय तुम जैसे पापियोंका वध करने और प्रबल भूभारका हरण करनेके लिये ही ये कश्यपपुत्र विनायक अवतीर्ण हुए हैं। तुम्हारी पापराशिके कारण वरदानका जो पुण्यबल था, वह शिथिल हो चुका है।' [राजाकी] ऐसी बात सुनकर दैत्यराज मन-ही-मन काँप उठा॥२३-२४॥ [तदुपरान्त] उसने दौड़कर राजाके हाथसे धनुष- बाण छीन लिया और बलपूर्वक भूतलपर पटक दिया, जिससे उसके सैकड़ों खण्ड हो गये। फिर नरान्तकने मुष्टिकासे राजापर प्रहार किया, जिससे वे वैसे ही भूतलपर गिर पड़े, जैसे वज्रके प्रहारसे पर्वत गिर जाता है॥ २५-२६॥ यह देखकर अपने गर्जनघोषसे सम्पूर्ण आकाश- मण्डल एवं दसों दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए महाबली विनायक अंकुश लेकर दौड़े। उस समय समस्त भूमण्डल काँप उठा और सभीके नेत्रोंको दृष्टिहीन बना देनेवाले परशुके तेजसे सारी दिशाएँ मानो धधकने लगीं। उन्होंने उस परशुसे दैत्यके मस्तकपर वैसे ही तीव्र प्रहार किया, जैसे इन्द्र पर्वतपर वज्राघात करते हैं। उनके आघात करते ही दैत्यराज भूतलपर गिर पड़ा॥२७-२९॥ जैसे शिलाके आघातसे मर्मस्थलके विदीर्ण होनेसे