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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 463, कुल 656 में से

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पृष्ठ 463

क्री०ख०-अ०८९ ] * पार्वतीका भाद्रमासकी चतुर्थीको गुणेशका पार्थिव-पूजन करना * ४६१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ध्यान आदि उपचार, जल, पंचामृत, अनेक प्रकारके वस्त्र, यज्ञोपवीत, गन्ध, धूप, दीप, नाना प्रकारके पुष्प, विविध नैवेद्य, अनेक प्रकारके फल, गीले पूगीफल एवं लवंग-इलायची आदिसे समन्वित ताम्बूल, दूर्वा, शमीपत्र तथा अनेक प्रकारकी दक्षिणाओंके समर्पणसे, अनेक प्रकारकी आरतियों, विविध मन्त्रपुष्पांजलियों, अनेक प्रकारके स्तुतिपाठ, प्रदक्षिणा एवं प्रार्थना तथा ब्राह्मणोंके पूजन करनेसे गणेशजीकी मिट्टीसे बनायी गयी वह मूर्ति सजीव हो उठी ॥ ८-११ ॥ उस समय उस मूर्तिकी आभाने करोड़ों सूर्योंकी प्रभाको जीत लिया। प्रलयकालीन अग्निकी ज्वालाको भी जीत लिया और अनन्त चन्द्रमाओंकी चाँदनीको भी फीका कर दिया। उस ज्योतिने गौरीके नेत्रोंकी प्रभाको भी क्षीण कर दिया, जिस कारण वे मूर्च्छित हो भूमिपर गिर पड़ीं। मुहूर्तभरमें जब उनकी मूर्च्छा टूटी तो वे उन जगदीशवरसे बोलीं- ॥ १२-१३ ॥ हे देव ! लगता है मेरे द्वारा आपके पूजन करनेमें कोई गड़बड़ी हो गयी है, जिसके द्वारा यह अभिचार कर्म किया गया है, मैं उसे नहीं जान पा रही हूँ। हे देव ! हे कृपानिधान ! मेरा प्रयत्न विफल क्यों हुआ ? ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन गौरीका इस प्रकारका वचन सुनकर वे प्रभु सौम्य तेजवाले हो गये। उस समय वे अपने समक्ष बालरूपी विनायकको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हो गयीं ॥ १५१/२ ॥ वे प्रभु विनायक असंख्य मुख, असंख्य नेत्र, असंख्य चरण, तथा असंख्य कण्ठ और असंख्य मुकुट धारण किये हुए थे। सूर्य, चन्द्रमा तथा अग्नि-ये उनके तीन नेत्र थे, वे मोतियों तथा मणियोंकी माला धारण किये हुए थे। अत्यन्त दीप्तिमान् थे, उन्होंने अपने हाथोंमें अनेक आयुधोंको धारण कर रखा था और उनके सभी अंग अत्यन्त सुन्दर थे। प्रभुके इस प्रकारके परम अद्भुत पावन स्वरूपका दर्शनकर वे अपने शुभ नेत्रोंको बन्दकर मन- ही-मन सोच-विचार में पड़ गयीं ॥ १६-१८१/२ ॥ उनका शरीर कम्पित होने लगा। वे यह नहीं समझ पा रही थीं कि इस समय मुझे क्या करना चाहिये। मैं जिनका ध्यान कर रही थी, क्या ये वे ही हैं अथवा मैं किसी अद्भुत अरिष्टको देख रही हूँ। तदनन्तर उन पार्वतीने अपने नेत्रोंको खोलकर दिव्य दृष्टिसे देखा तो उन्हें उस समय भगवान् शिवके द्वारा बताये गये उपदेशके अनुसार वह सब ज्ञात हो गया और वे बोलीं- ॥ १९-२०१/२ ॥ पार्वतीजी बोलीं-इन्हींकी मायासे मोहित होकर मैं अपने समक्ष [स्थित] इन प्रभुको नहीं पहचान पा रही हूँ। तब फिर उन्होंने उनसे पूछा, आप कौन हैं ? आपका आगमन कहाँसे हो रहा है ? आप किसलिये यहाँ आये हैं ? यदि आप गुणेश हैं तो वह मुझे बतलायें ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले-उनका यह वचन सुनकर वे महापुरुष अपने शब्दोंकी ध्वनिसे सभी दिशाओं तथा विदिशाओंको निनादित करते हुए बोले- ॥ २३ ॥ देव बोले-हे शुभे ! आप अनुष्ठान करते हुए रात-दिन जिनका ध्यान करती हैं, मैं वही परम पुरुष गुणेश हूँ, मैं परसे भी परतर हूँ। चूँकि वराभिलाषिणी आपसे मैंने कहा था कि मैं आपका पुत्र बनूँगा, इसलिये आपके घरमें अवतरित हुआ हूँ। हे देवि ! इस समय जो मुझे करणीय है, उसे आप सुनें ॥ २४-२५ ॥ मुझे आप दोनों माता-पिताकी सेवा करनी है, दैत्य सिन्धुका वध करना है और देवताओंको उनका अपना- अपना पद प्रदान करना है। [यह सब करनेके] अनन्तर मैं अपने धामको चला जाऊँगा ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी बोले-उन भगवान् गुणेश्वरके वचनामृतका पान करके वे देवी पार्वती परम प्रसन्न होकर उनसे बोलीं- ॥ २७ ॥ गिरिजा बोलीं-आज मेरा परम सौभाग्य सफल हुआ है, यह मेरी तपस्याका परम उत्तम फल है, जो कि मैंने अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंके नायक, चिदानन्दघन प्रभु परमात्माका दर्शन किया है, जिनसे अनेक प्रकारकी सृष्टि प्रादुर्भूत हुई है ॥ २८ ॥ पृथ्वी, जल, तेज, वायु तथा आकाश-इन पंचमहाभूतों, ब्रह्मा, शिव, विष्णु, चन्द्रमा, इन्द्र, सूर्य, नक्षत्र, गन्धर्व, यक्ष, मुनिगण, वृक्ष, पर्वत, सभी पक्षीगण, Kalyana Visheshank 2021_Section_16_2_Front