भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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६१६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 किंतु वशमें करनेवाले लोगोंको पीड़ा नहीं देते, इसी | धारणाओंसे योग सिद्ध होता है, अतः योगी निरन्तर प्रकार यह वायु प्राणायामसे स्थिर होकर पापोंको तो | धारणाका अभ्यास करे। हे राजन् ! जो इस प्रकार साधना भस्म करता है, परंतु शरीरको नहीं जलाता ॥ ३१॥ | करते हैं, उन्हें त्रिकालका ज्ञान हो जाता है और जिस प्रकार क्रमसे मनुष्य सीढ़ियोंपर चढ़ता है, | अनायास त्रिलोकी उनके वशमें हो जाती है ॥ ३४-३५॥ इसी प्रकार योगीके लिये क्रमसे प्राण-अपानको वशमें | वह अपने अन्तरात्मामें समस्त जगत्को ब्रह्मरूप करना उचित है। *पूरक-कुम्भक और रेचकका अभ्यास | देखता है। इस प्रकारसे कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों करके यह प्राणी इस जगत्में भूत, भविष्य तथा वर्तमान | समान फलके देनेवाले हैं। सभी प्राणियोंके हितकारी तीनों कालोंका ज्ञाता हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ | और कर्मका फल देनेवाले एवं त्रिलोकीमें व्यापक मुझ बारह उत्तम प्राणायामोंसे उत्तम धारणा होती है, दो | ईश्वरको जानकर मनुष्य मुक्त हो जाते हैं ॥ ३६-३७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके क्रीडाखण्डमें 'वैध-संन्यासयोग' नामक एक सौ इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १४१ ॥ एक सौ बयालीसवाँ अध्याय योगावृत्तिकी प्रशंसा श्रीगणेशजी बोले- हे राजन् ! जो श्रुति और | अधिकतावाले देशमें, जिस स्थानमें ध्वनि अधिक हो, जो स्मृतिमें कहे हुए कर्मोंको फलकी इच्छा न करके करता | टूटा-फूटा हो, गोष्ठ, अग्निके निकट, जलके निकट, कूपके है, वह योगी कर्मका त्याग करनेवाले योगियोंसे श्रेष्ठ है। | निकट, श्मशान, नदी, दीवारके निकट तथा जहाँ शुष्क हे महाभुज ! मेरे मतमें योगप्राप्तिके निमित्त कर्म ही | पर्णका शब्द सुनायी पड़ता हो, चैत्य वृक्षके नीचे, वल्मीक कारण है, योगसिद्धिकी उपलब्धिके निमित्त शम और | (बाँबी)-वाले स्थानमें और पिशाचादिसे युक्त स्थानमें दम ही कारण हैं ॥ १-२॥ | योगध्यानपरायण योगी योगाभ्यास न करे ॥ ७-९ ॥ इन्द्रियोंके विषयोंका संकल्पकर कर्म करनेवाला | स्मृतिका लोप होना, गूँगापन, बधिरता, मन्दता, आत्माका शत्रु ही होता है और जो इनकी इच्छा न करके | ज्वर, जड़ता-ये सब विकार योगाभ्याससम्बन्धी दोषोंके कर्म करता है, वही योगी सिद्धिको प्राप्त होता है ॥ ३ ॥ | अज्ञानसे योगीको होते हैं। योगाभ्यासीको ये सब एकमात्र आत्मा ही आत्माका मित्र और शत्रु है, | दोषपूर्ण स्थान त्याग देने चाहिये, ऐसा न करनेसे अवश्य यही ज्ञान होनेसे उद्धार करता है और यही अज्ञान होनेसे | ही स्मृतिलोप आदि दोष होते हैं ॥ १०-११ ॥ बन्धनमें डालता है, दूसरा कोई नहीं ॥ ४ ॥ | हे राजन् ! योगी सदा थोड़ा भोजन करे, बिना मान, अपमान, सुख, दुःख, बन्धु, साधु, मित्र, | भोजन किये भी न रहे, न बहुत सोये, न बहुत जागे- अमित्र, उदासीन, द्वेषी, मिट्टीके ढेले और सुवर्ण इत्यादिमें | इस प्रकार सदा योगाभ्यास करनेसे सिद्धिको प्राप्त हो समान बुद्धि रखनेवाला, जितेन्द्रिय, विज्ञानी और जितात्मा | जाता है। सम्पूर्ण इच्छा और कामनाओंका त्याग करे, साधक सदा योगका अभ्यास करता रहे, जबतक कि | थोड़ा भोजन करे, जागरणशील हो, बुद्धिसे सब इन्द्रियोंको उसको योगकी सिद्धि न हो जाय ॥ ५-६॥ | वशमें करके शनैः शनैः [ऐन्द्रिय विषयोंसे] विरत हो जो सन्तप्त हो, श्रान्त हो, व्याकुल, क्षुधित अथवा | जाय ॥ १२-१३ ॥ व्यग्रचित्त हो, वह योगाभ्यास न करे। अतिशीतकाल | जिस-जिस स्थानमें मन जाय, उस-उस स्थानसे अथवा अति उष्णकाल, अग्नि, वायु और जलकी | उसे खींचे और धैर्यसे उसे अपने वशमें करे, क्योंकि वह *पूरक-वायुको ऊपर खींचना, कुम्भक - वायुका रोध करना, रेचक- वायुका त्याग करना- ये तीन प्राणायामके अंग हैं।