श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 641, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्री०ख०-अ०१५५] * गणेशपुराणीय माहात्म्य-निरूपणके प्रसंगमें विविध इतिहास * ६३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] हे मुनियो! अब एक अन्य प्राचीन इतिहासका श्रवण कीजिये। इक्ष्वाकुवंशमें संवरण नामके एक परम धार्मिक राजा हुए थे। वे यज्ञकर्ता, दाता, पवित्र, लोकरक्षक, स्वाध्यायनिरत, शत्रुहन्ता तथा प्रजापालनमें तत्पर थे। वे सभी धर्मोंका प्रतिपादन करनेमें समर्थ, प्रजाकी आयका छठा भाग ही ग्रहण करनेवाले, लोकपूजित और [सबको] परमप्रिय थे। उनकी ख्याति तीनों लोकोंमें फैली थी॥ ३३-३५ १/२॥ महाराज संवरण सन्तानहीन थे, इसलिये उन्होंने पुत्रेष्टि नामक यागका आरम्भ किया। संवरणने यद्यपि दक्षिणा एवं अन्नदानसे समन्वित पुत्रेष्टिका सांगोपांग सम्पादन किया था, तथापि उन्हें सन्तानप्राप्ति नहीं हुई, तब उन्होंने हरिवंशपुराणका श्रवण किया और ब्राह्मणोंकी पूजा करनेके बाद कथावाचकको भी वस्त्र, धेनु, सुवर्ण, रत्न, मूल, फल आदिके द्वारा सन्तुष्ट किया॥ ३६-३८॥ इतना करनेपर भी उन्हें पुत्रप्राप्ति न हो सकी। [इसके कुछ दिन बाद] दैवयोगसे उनके भवनमें मूकमुनिका आगमन हुआ, जो कि गणेशपुराणके मर्मज्ञके रूपमें प्रसिद्ध थे॥ ३९॥ राजा संवरणने प्रार्थना करके उनको अपने यहाँ रोक लिया और बड़ी प्रसन्नताके साथ उनके मुखसे गणेशपुराणका श्रवण किया। पुराणश्रवणके बाद राजाने उन द्विजश्रेष्ठ मूकको रत्न, मुक्ताफल, वस्त्र तथा स्वर्णांलंकारादि समर्पित करके प्रसन्न किया। इसके [कुछ काल] बाद राजाको पुत्रकी प्राप्ति हुई और वे गणेशजीकी भक्तिमें तत्पर हो गये। उन्होंने अनेक सुखोंको भोगनेके पश्चात् गणपतिदेवके परमधामको प्राप्त किया॥ ४०-४२॥ राजा संवरणकी एक वन्ध्या बहन थी, वह तीस वर्षकी तरुण-अवस्थाको प्राप्त करके भी रजोधर्मसे रहित थी। उसने जब सुना कि 'यथोचित समय आनेपर राजाको सन्तानप्राप्ति हुई है और वह सन्ततिलाभ गणेशपुराणके श्रवणका परिणाम है' तो उसने मूक
[दायाँ स्तम्भ] मुनिको बुलाया और उनके मुखसे मंगलमय गणेशपुराणका श्रवण किया। गणेशजीकी भक्तिमें निरत उस महिलाने भी परम शूर पुत्रको प्राप्त किया। इसके अतिरिक्त और भी बहुत-से पुत्र-पौत्रोंको प्राप्तकर तथा मनोहर भोगोंको भोगनेके पश्चात् उसका देहावसान हुआ और उसने गणपतिके परमधामको पा लिया॥ ४३-४५ १/२॥ प्राचीनकालकी बात है। राजा सगरके पुत्रोंमें एक पुत्र पंगु था। उसने विनयपूर्वक भक्तिभावसे बारह वर्षोंतक महर्षि लोमशसे इस पवित्र पुराणका श्रवण किया तथा बड़ी भक्तिसे लोमशजीको [नानाविध] द्रव्य समर्पित करके सन्तुष्ट किया। इससे उसके चरण स्वस्थ हो गये और उसने विजय, पुष्टि तथा दीर्घायुष्यके साथ- साथ अन्तमें गणपतिदेवके उस परमधामको भी प्राप्त कर लिया॥ ४६-४८॥ अठारह पुराणोंका श्रवण करनेसे जो पुण्यफल प्राप्त होता है, वही पुण्यफल एकमात्र गणेशपुराणको सुननेसे भी मिल जाता है। हे विप्रो! काकवन्ध्या नारी इसका श्रवण करके बहुत-से पुत्रोंको प्राप्त करती है और जिस स्त्रीका बार-बार गर्भपात होता है, वह स्थिर गर्भवाली हो जाती है॥ ४९-५०॥ हे मुनिवरो! इसका श्रवण करके गूँगा व्यक्ति बृहस्पतिके सदृश भाषणकुशल हो जाता है और वेदाभ्यासी श्रेष्ठ ब्राह्मण निस्सन्देह सर्वमान्य और सर्वज्ञ बन जाता है॥ ५१॥ गणेशपुराणका [सतत] स्मरण-चिन्तन करते रहनेसे शूद्र वैश्यत्व, वैश्य क्षत्रियत्व तथा क्षत्रिय ब्राह्मणत्वरूप वर्णोत्कर्षको प्राप्त कर लेता है॥ ५२॥ इस पुराणके एक अध्यायका भी श्रवण करनेसे कुमारी कन्या गुणवान्, कुलीन, समृद्ध और सदाचारी पतिको प्राप्त कर लेती है और जन्मान्ध मनुष्य पुराणके श्रवणसे देखनेकी शक्ति पा लेता है। जो मनुष्य समस्त तीर्थोंमें स्नान करता है और सब प्रकारके दान देता है, उसे जिस फलकी प्राप्ति होती है, वही फल इस पुराणको भक्तिभावसे सुननेवाला पा लेता है॥ ५३-५४ १/२॥