भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन १०३

ग्रहोंके शुभ एवं अशुभ स्थान तथा उनके अनुसार शुभाशुभ फलका संक्षिप्त विवेचन

श्रीहरिने कहा—लग्नसे सप्तम भाव तथा उपचयमें स्थित चन्द्रमा सर्वत्र मङ्गलकारी होता है। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथि तथा पञ्चम और नवम भावमें स्थित चन्द्रमा गुरुके सदृश पूज्य है।

हे शिव! चन्द्रमाकी बारह अवस्थाएँ हैं। आप उनके विषयमें भी सुनें। अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंसे एक-एक अवस्था बनती है। अतः उन अश्विनी आदि तीन-तीन नक्षत्रोंके क्रमसे 'प्रवासावस्था, दृष्टावस्था, मृतावस्था, जयावस्था, हास्यावस्था, नतावस्था, प्रमोदावस्था, विषादावस्था, भोगावस्था, ज्वरावस्था, कम्पावस्था तथा सुखावस्था'—ये चन्द्रकी बारह अवस्थाएँ होती हैं।

इन्हीं अवस्थाओंके क्रममें चन्द्रकी स्थिति होनेपर क्रमशः—प्रवास, हानि, मृत्यु, जय, हास, रति, सुख, शोक, भोग, ज्वर, कम्प तथा सुख—ये फल प्राप्त होते हैं।

चन्द्रके जन्मलग्नमें होनेपर तुष्टि, द्वितीय भावमें रहनेपर सुख-हानि, तृतीय भावमें रहनेपर राजसम्मान, चतुर्थ भावमें कलह और पञ्चम भावमें रहनेपर स्त्रीका लाभ होता है। यदि चन्द्र षष्ठ (स्थान) भावमें रहता है तो धन-धान्यकी प्राप्ति, सप्तम भावमें रहनेपर प्रेम तथा सम्मानकी प्राप्ति होती है। चन्द्रमाके अष्टम भाव (स्थान)-में रहनेपर मनुष्यके प्राणोंको संकट बना रहता है। नवम भावमें उसकी स्थिति रहनेपर कोषमें धनकी वृद्धि होती है। दशम भावमें चन्द्रके रहनेपर कार्यसिद्धि और एकादश भावमें होनेपर विजय निश्चित है। जब वह द्वादश भावमें रहता है तो जातककी निश्चित ही मृत्यु होती है। इसमें संदेह नहीं है।

कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेषा—इन सात नक्षत्रोंमें पूर्व दिशाकी यात्रा करनी चाहिये। मघा, पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती तथा विशाखा—इन सात नक्षत्रोंमें दक्षिणकी यात्रा करनी चाहिये। अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ, उत्तराषाढ, श्रवण और धनिष्ठा—इन सात नक्षत्रोंमें पश्चिमकी यात्रा करनी चाहिये। धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद, रेवती, अश्विनी और भरणी—इन सात नक्षत्रोंमें उत्तरकी यात्रा प्रशस्त होती है।

अश्विनी, रेवती, चित्रा तथा धनिष्ठा नक्षत्र नवीन अलंकारोंको धारण करनेके लिये श्रेष्ठ हैं। मृगशिरा, अश्विनी, चित्रा, पुष्य, मूल और हस्त नक्षत्र कन्यादान, यात्रा तथा प्रतिष्ठादि कार्योंमें शुभप्रद होते हैं।

जन्मलग्नमें शुक्र और चन्द्रके रहनेपर शुभ फलकी प्राप्ति होती है। उसी प्रकार ये दोनों ग्रह द्वितीय भावमें रहनेपर भी शुभ फल प्रदान करते हैं। तृतीय भावमें स्थित चन्द्र, बुध, शुक्र और बृहस्पति, चतुर्थ भावमें मंगल, शनि, चन्द्र, सूर्य और बुध श्रेष्ठ होते हैं। पञ्चम भावमें शुक्र, बृहस्पति, चन्द्रमा और केतुके रहनेपर शुभ होता है। षष्ठ भावमें शनि, सूर्य और मंगल, सप्तम भावमें बृहस्पति तथा चन्द्रमा शुभ हैं। इसी प्रकार अष्टम भावमें बुध और शुक्र तथा नवम भावमें स्थित गुरु शुभ फल देनेवाला है। जन्मके दशम भावमें स्थित सूर्य, शनि एवं चन्द्रमा तथा एकादश भावमें सभी ग्रह शुभ फल देते हैं। ऐसे ही जन्मके द्वादश भावमें स्थित बुध और शुक्र सब प्रकारके सुखोंको प्रदान करते हैं।