गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १३८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त कर लेना चाहिये।
चौथे दिन फल्गुतीर्थमें स्नान करके देवादिकोंका तर्पण करे और उसके बाद गयाशीर्षमें रुद्रपदादि तीर्थोंमें जाकर वह पितरोंके लिये श्राद्ध करे।
तदनन्तर व्यास, देहिमुख, पञ्चाग्नि तथा पदत्रय नामक तीर्थमें पिण्डदान करके सूर्यतीर्थ, सोमतीर्थ एवं कार्तिकेय-तीर्थमें जाकर किये गये श्राद्धका फल अक्षय होता है।
गयातीर्थमें नवदैवत्य और द्वादशदैवत्य नामक श्राद्ध करना चाहिये। अन्वष्टका तिथियोंमें, वृद्धिश्राद्धमें, गयामें और मृत्युतिथिमें माताके लिये पृथक् रूपसे श्राद्ध करनेका विधान है। अन्यत्र तीर्थोंमें पिताके साथ ही माताका श्राद्ध करना चाहिये<sup>१</sup>। दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करके पितामहका दर्शनकर यदि मनुष्य रुद्रपादका स्पर्श करता है तो वह पुनः इस लोकमें नहीं आता है।
वित्तपरिपूर्ण समग्र पृथिवीका तीन बार दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह फल गयाशिरतीर्थमें श्राद्ध करनेपर प्राप्त हो जाता है। इस गयाशिरतीर्थमें शमीपत्र प्रमाणके बराबर पिण्डदान करना चाहिये। इससे पितृगण देवत्वको प्राप्त करते हैं। इस कार्यमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है<sup>२</sup>।
भगवान् शिवने मुण्डपृष्ठतीर्थपर अपना चरण रखा था। अतः उस तीर्थमें अल्पमात्र तपस्यासे ही मनुष्य महान् पुण्य प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति गयाशीर्षतीर्थमें नामोच्चारके साथ जिन पितरोंको पिण्डदान करता है उससे नरकलोकमें निवास करनेवाले पितृजन स्वर्गलोक एवं स्वर्गमें रहनेवाले पितरोंको मोक्ष प्राप्त हो जाता है—
मुण्डपृष्ठे पदं न्यस्तं महादेवेन धीमता॥
<div style="text-align: right;">(८४।२८-३०)</div>
अल्पेन तपसा तत्र महापुण्यमवाप्नुयात्।
गयाशीर्षे तु यः पिण्डान्नाम्ना येषां तु निर्वपेत्॥
नरकस्था दिवं यान्ति स्वर्गस्था मोक्षमाप्नुयुः।
पाँचवें दिन गदालोलतीर्थमें स्नान करके अक्षयवटके नीचे पिण्डदान करनेवाला अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है। अक्षयवटके मूलमें शाक अथवा उष्णोदकसे एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल प्राप्त हो जाता है<sup>३</sup>। अक्षयवटमें श्राद्ध करनेके पश्चात् प्रपितामहका दर्शन करके मनुष्य अक्षय लोकोंको प्राप्त करता है एवं अपने सौ कुलोंका उद्धार कर देता है।
मनुष्यको बहुत-से पुत्रोंकी कामना करनी चाहिये, क्योंकि उनमेंसे एक भी पुत्र गयातीर्थमें जाय अथवा अश्वमेध-यज्ञ करे या नीलवृषोत्सर्ग करे<sup>४</sup>।
एक प्रेतने किसी वणिक्से कहा—हे वणिक्! गयाशीर्षतीर्थमें तुम मेरे नामसे पिण्डदान करो, जिससे मैं इस प्रेतयोनिसे मुक्त हो जाऊँगा। यह पिण्डदान दाताके लिये भी स्वर्गप्रदान करनेवाला होगा। ऐसा सुनकर उस वणिकने गयाशीर्षतीर्थमें उस प्रेतराजके लिये पिण्डदान किया। तदनन्तर अपने छोटे भाइयोंके साथ उसने अपने पितृजनोंको भी पिण्डदान प्रदान किया। वणिक्के द्वारा
१-श्राद्धं तु नवदैवत्यं कुर्याद्द्वादशदैवतम्। अन्वष्टकासु वृद्धौ च गयायां मृतवासरे॥
अत्र मातुः पृथक् श्राद्धमन्यत्र पतिना सह। ............................................॥ (८४।२४-२५)
२-त्रिवित्तपूर्णां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात्॥ ............................................॥
स तत्फलमवाप्नोति कृत्वा श्राद्धं गयाशिरे। शमीपत्रप्रमाणेन पिण्डं दद्याद् गयाशिरे॥
पितरो यान्ति देवत्वं नात्र कार्या विचारणा। ............................................॥ (८४।२६-२८)
३-वटमूलं समासाद्य शाकेनोष्णोदकेन वा॥ एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिताः। (८४।३१-३२)
४-एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत्॥ यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत्। (८४।३३-३४)