भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य १४१


हो गयी है, जो विद्युत्से या चोरोंके द्वारा मारे गये हैं, उनके लिये मैं पिण्ड दे रहा हूँ। जो रौरव, अन्धतामिस्र तथा कालसूत्र नामक नरकोंमें गये हैं, उन सबके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो असिपत्रवन और घोरकुम्भीपाक नामक नरकोंमें पड़े हुए हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। अन्य जो यातना भोग रहे हैं और प्रेतलोकमें निवास कर रहे हैं, उनके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।

जो पितृगण पशुयोनिमें चले गये हैं अथवा जो पक्षी, कीट-पतंग, सर्प, सरीसृप (छिपकली, गिरगिट, सर्पादि) हो गये हैं या जो वृक्षयोनिमें अवस्थित हैं, उनके लिये मैं यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो यमराजके शासनादेशसे यमगणोंके द्वारा असंख्य यातनाओंके बीच पहुँचाये गये हैं, उन सभीके उद्धारके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ। जो अपने कर्मानुसार हजारों योनियोंमें घूमते हुए कष्ट भोग रहे हैं, जिनको मानुषयोनि दुर्लभ है, उन सभीके लिये यह पिण्ड दे रहा हूँ।

जो हमारे बान्धव हैं या बान्धव नहीं हैं अथवा जो अन्य जन्मोंमें मेरे बन्धु-बान्धव रहे हैं, वे मेरे द्वारा दिये गये इस पिण्डदानसे सदैव तृप्तिको प्राप्त करें। जो कोई भी पितृजन प्रेतरूपमें अवस्थित हैं, वे सभी इस पिण्डदानसे तृप्ति प्राप्त करें।

जो हमारे पितृकुल, मातृकुल, गुरु, श्वशुर, बान्धव अथवा अन्य सम्बन्धियोंके कुलमें उत्पन्न होकर मृत्युको प्राप्त हुए हैं और जो अन्य बान्धव हैं, जो मेरे कुलमें पुत्र-पत्नीसे रहित होनेके कारण लुप्तपिण्ड हैं, क्रियालोपसे जिनकी दुर्गति हुई है, जो जन्मान्ध या पंगु हैं, जो विरूप हैं अथवा अल्पगर्भमें ही मृत्युको प्राप्त हुए हैं, जो ज्ञात अथवा अज्ञात हैं, उनके निमित्त मेरे द्वारा दिया गया यह पिण्डदान अक्षय होकर उन्हें प्राप्त हो।

ब्रह्मा और ईशान आदि देव ! आप सब मेरे इस कार्यमें साक्षी हों। मैंने गयातीर्थमें आ करके पितरोंके उद्धारके लिये यह पिण्डदानादिक कार्य सम्पन्न किया है।

हे देव ! भगवान् गदाधर विष्णु ! मैं पितृकार्यके लिये इस गयातीर्थमें उपस्थित हुआ हूँ। मेरे द्वारा सम्पन्न किये गये आजके इस पितृकार्यमें आप साक्षी हों। आज मैं (देव-गुरु एवं पितृ) तीनों ऋणोंसे विमुक्त हो गया हूँ। (अध्याय ८५)


गयाके तीर्थोंकी महिमा तथा आदिगदाधरका माहात्म्य

ब्रह्माजीने कहा— इस गयाक्षेत्रमें जो विख्यात प्रेतशिला है, वह प्रभास, प्रेतकुण्ड एवं गयासुरशीर्ष नामक तीर्थोंमें तीन प्रकारसे अवस्थित है। सर्वदेवमयी इस शिलाको धर्मदेवताके द्वारा ऐश्वर्यके लिये धारण किया गया है। अपने मित्रादिक बन्धु-बान्धवोंमें जिन लोगोंको प्रेतयोनि प्राप्त हो गयी है, उनका उद्धार करनेके लिये यह प्रेतशिला शुभ है। अतएव मुनिजन, नृपगण तथा राजपत्नयादि इस प्रेतशिलापर आ करके अपने पितृजनोंके लिये श्राद्धादिकर ब्रह्मलोक प्राप्त करते हैं।

गयासुरके मुण्डके पृष्ठभागमें जो शिला स्थित है, उसका नाम 'मुण्डपृष्ठगिरि' है, इसी कारण यह पर्वत सर्वदेवमय है। इसके पाददेशमें ब्रह्मसरोवरादि अनेक तीर्थ हैं। उन तीर्थोंमें एक अरविन्दवन नामक तीर्थ है। उस वनसे सुशोभित होनेके कारण उसके पर्वतीय प्रान्त-भागको 'अरविन्दगिरि' कहते हैं। वहाँपर क्रौञ्च पक्षियोंके चरण-चिह्न विद्यमान रहते हैं। इसलिये वह पर्वतीय भाग 'क्रौञ्चपाद' के