भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] चौदह मन्वन्तरोंका वर्णन तथा अठारह विद्याओंके नाम १४५

अवतार धारण करके उस दैत्यका विनाश किया था।

अब मैं भविष्यमें होनेवाले सावणि मनुके पुत्रोंका वर्णन कर रहा हूँ। उन मनुके विजय, आर्ववीर, निर्मोह, सत्यवाक्, कृति, वरिष्ठ, गरिष्ठ, वाच, संगति नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें अश्वत्थामा, कृपाचार्य, व्यास, गालव, दीप्तिमान्, ऋष्यशृंग और परशुराम—ये सात ऋषि कहे गये हैं। सुतपा, अमिताभ तथा मुख्य नामक तीन देवगण हैं, जिनके प्रत्येक गणमें बीस-बीस देव माने गये हैं। विरोचन-पुत्र बलि इन्द्र होंगे, जो वामनरूपधारी भगवान् विष्णुके द्वारा याचित तीन पग भूमिदान देनेसे ऐश्वर्यसम्पन्न इन्द्रपदको छोड़कर सिद्धि प्राप्त करेंगे।

हे ब्रह्मा ! नवें वरुणपुत्र दक्षसावर्णि मनुके पुत्रोंको सुनें। धृतिकेतु, दीप्तिकेतु, पञ्चहस्त, निरामय, पृथुश्रवा, बृहद्द्युम्न, ऋचीक तथा बृहद्गुण नामके पुत्र हुए। इस मन्वन्तरमें मेधातिथि, द्युति, सवस, वसु, ज्योतिष्मान् हव्य और कव्य तथा विभु—ये सप्तर्षि हुए। पर, मरीचिगर्भ तथा सुधर्मा—ये तीन देवता हुए। इस मन्वन्तरमें कालकाक्ष नामक देवशत्रु हुआ, जिसका वध पद्मनाभ विष्णुने किया था।

दसवें मनु (धर्म)-के पुत्र धर्मसावर्णिके पुत्रोंको सुनो—सुक्षेत्र, उत्तमौजा, भूरिश्रेण्य, शतानीक, निरमित्र, वृषसेन, जयद्रथ, भूरिद्युम्न, सुवर्चा, शान्ति एवं इन्द्र नामक महाप्रतापी पुत्र थे। इस मन्वन्तरमें अयोमूर्ति, हविष्मान्, सुकृति, अव्यय, नाभाग, अप्रतिमौजा और सौरभ नामक सप्तर्षि हुए। इसमें देवताओंके प्राण नामके एक सौ गण विद्यमान थे। उन गणोंके इन्द्र महाबलशाली शान्त नामक देवपुरुष थे। उनका शत्रु बलि नामक असुर होगा। भगवान् विष्णु अपनी गदासे उसका वध करेंगे।

हे रुद्र ! अब मैं आपके पुत्र एकादश मनु (रुद्रसावर्णि)-की संतानोंका वर्णन करता हूँ। इनके सर्वत्रग, सुशर्मा, देवानीक, पुरु, गुरु, क्षेत्रवर्ण, दृढेषु, आर्द्रक तथा पुत्र नामक पुत्र होंगे। इस मन्वन्तरमें हविष्मान्, हविष्य, वरुण, विश्व, विस्तर, विष्णु और अग्नितेज नामक सप्तर्षि कहे गये हैं और इसमें विहङ्गम, कामगम, निर्माण तथा रुचि नामक चार देवगण हुए। एक-एक गणमें तीस-तीस देवता कहे गये हैं। उन समस्त देवगणोंके इन्द्र वृषभ हुए; जिनका शत्रु दशग्रीव नामक राक्षस होगा। लक्ष्मीका रूप धारण करके विष्णु उसका विनाश करेंगे।

इसके पश्चात् दक्षके पुत्र दक्षसावर्णि बारहवें मनु हुए। उनके पुत्रोंका वर्णन सुनें—इन मनुके देववान्, उपदेव, देवश्रेष्ठ, विदूरथ, मित्रवान्, मित्रदेव, मित्रबिन्दु, वीर्यवान्, मित्रवाह, प्रवाह नामक पुत्र हैं। इस मन्वन्तरमें तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोरति, तपोघृति, द्युति तथा तपोधन नामसे विख्यात सप्तर्षि हुए। स्वधर्मा, सुतपस, हरित और रोहित नामक देव सुरगण हैं। उनके प्रत्येक गणोंमें दस-दस देव हुए। हे शिव ! इस मन्वन्तरमें ऋतधामा नामके इन्द्र होंगे। उनका शत्रु तारकासुर होगा। विष्णु नपुंसकस्वरूप धारण करके उसका वध करेंगे।

तदनन्तर रौच्य नामक त्रयोदश मनुके पुत्रोंको मुझसे सुनें। इन मनुके चित्रसेन, विचित्र, तप, धर्मरत, धृति, सुनेत्र, क्षेत्रवृत्ति तथा सुनय नामक पुत्र कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें धर्म, धृतिमान्, अव्यय, निशारूप, निरुत्सक, निर्मोह और तत्त्वदर्शी नामक सप्तर्षि कहे गये हैं। इस मन्वन्तरमें सुरोम, सुधर्म तथा सुकर्म—तीन देवगणोंका उद्भव हुआ। इन सभी गणोंमें तैंतीस-तैंतीस देवगण कहे गये हैं। इन देवगणोंका इन्द्र दिवस्पति और शत्रु त्वष्टिभ नामक दानव था। भगवान् विष्णु मयूरका स्वरूप