गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १४८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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| पितरोंने कहा—हे वत्स! यदि तुम हमारे वचनका अनुपालन नहीं करते हो तो निश्चित ही हम सभी पितरोंका पतन होगा और तुम्हारी अधोगति होगी। | हे मुनिश्रेष्ठ! ऐसा कहकर उस प्रजापति रुचिके सभी पितृगण देखते-ही-देखते वायुवेगके झोंकोंसे बुझे हुए दीपकोंके समान सहसा अदृश्य हो गये।<br>(अध्याय ८८) |
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रुचिद्वारा की गयी पितृस्तुति तथा श्राद्धमें इस पितृस्तुतिके पाठका माहात्म्य
पितृजनोंके द्वारा उस प्रकारके वाक्यको सुनकर वे ब्रह्मर्षि रुचि मन-ही-मन अत्यधिक व्याकुल हो उठे और कन्या प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथिवीलोकमें विचरने लगे, किंतु उन्हें कोई कन्या प्राप्त न हो सकी। अतएव पितरोंके उक्त वचनरूपी अग्निसे संतप्त हुए वे अतिशय चिन्ताग्रस्त होकर व्यग्र-मनसे इस प्रकार सोचने लगे—
‘मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे पितृगणोंका और मेरा अभ्युदय करनेवाला वह स्त्री-परिग्रह (विवाह-संस्कार) किस प्रकार हो सकेगा?’
इस प्रकार चिन्तन करते हुए उनके मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं कमलयोनि उन ब्रह्माको ही तपस्याके द्वारा प्रसन्न करता हूँ। तदनन्तर महात्मा रुचिने सौ दिव्य वर्षोंतक कठिन तप किया। वे तपस्याके लिये वनमें एक ही स्थानपर चिरकालतक अवस्थित रहे।
तत्पश्चात् जगत्पितामह ब्रह्माने दर्शन दिया और कहा कि मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, तुम अपनी अभिलाषा प्रकट करो। तदनन्तर सम्पूर्ण संसारको गति प्रदान करनेवाले उन आराध्य-देव ब्रह्माको प्रणाम करके रुचिने पितृजनोंके कथनानुसार जो-जो उनकी अभिलाषा थी। उनसे निवेदन किया।
इसपर ब्रह्माजीने कहा—हे विप्र! तुम प्रजापति होओगे। तुम्हारे द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि होगी। प्रजारूपी पुत्रोंकी उत्पत्ति करके ही तुम पितृजनोंके लिये श्राद्ध एवं पिण्डदानादिको सम्पन्न करनेके पश्चात् साधिकार उक्त कामनाकी सिद्धि प्राप्त कर सकोगे। अतः तुम्हारे पितरोंके द्वारा उचित ही कहा गया है कि ‘तुम स्त्री-परिग्रह करो।’ इस अभिलाषाको भलीभाँति ध्यानमें रखते हुए तुम्हें पितरोंकी ही पूजा करनी चाहिये। प्रसन्न होकर वे ही पितृगण तुम्हारी इस कामनाको पूर्ण करेंगे। सम्यक् पूजासे संतुष्ट हुए पितामहादि पितृगण स्त्री-पुत्र आदि क्या नहीं दे सकते।
ब्रह्माजीका इस प्रकारका वचन सुनकर ऋषि रुचिने नदीके एकान्त तटपर पहुँच करके अपने