गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह [ १५३
आपको पुत्र होगा। हे रुचि! वह बुद्धिमान् मन्वन्तराधिप होकर आपके ही रौच्य इस नामसे तीनों लोकोंमें ख्याति प्राप्त करेगा। उसके भी अतिशय बलवान्, महापराक्रमशाली, महात्मा और पृथिवीका पालन करनेवाले बहुत-से पुत्र होंगे। आप भी प्रजापति होकर चार प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टि करके अधिकार समाप्त होनेपर धर्मके तत्त्वज्ञानको प्राप्तकर सिद्धि प्राप्त करेंगे।
जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस स्तुतिसे हम सभीको संतुष्ट करेगा, उससे प्रसन्न होकर हम लोग उसे उत्तम भोग, आत्मविषयक उत्तम ध्यान, आयु, आरोग्य तथा पुत्र-पौत्रादि प्रदान करेंगे। अतः कामनाओंकी पूर्ति चाहनेवाले श्रद्धालुओंको निरन्तर इस स्तोत्रसे पितरोंकी स्तुति करनी चाहिये। जो मनुष्य श्राद्धमें भोजन कर रहे श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके समक्ष भक्तिपूर्वक अत्यन्त प्रिय इस स्तोत्रका पाठ करेगा तो उस स्तवनको सुननेके प्रेमसे हम सबकी भी वहाँ उपस्थिति रहेगी। हम लोगोंकी उपस्थितिके कारण वह श्राद्ध अक्षय होगा, इसमें संदेह नहीं है<sup>१</sup>।
जिस श्राद्धमें इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस श्राद्धमें हमारी तृप्ति बारह वर्षतकके लिये हो जाती है। हेमन्त-ऋतुमें इस स्तोत्रका पाठ बारह वर्षपर्यन्त हमें संतृप्ति प्रदान करता है। शिशिर-ऋतुमें इस शुभ स्तोत्रका पाठ करनेसे चौबीस वर्षोंतक हमारी तृप्ति रहती है। वसन्त एवं ग्रीष्म-ऋतुमें सम्पन्न होनेवाले श्राद्ध-कर्मके अवसरपर इस स्तोत्रका पाठ हम लोगोंके लिये सोलह वर्षोतक तृप्ति प्रदान करनेका साधन होता है। हे रुचे! वर्षाकालके दिनोंमें इस स्तोत्र-पाठके साथ किया गया श्राद्ध हम सभीके लिये अक्षय तृप्ति प्रदान करनेवाला होता है। शरत्कालमें सम्पादित श्राद्धके अवसरपर पठित यह स्तोत्र हम लोगोंको पंद्रहवर्षीय तृप्ति प्रदान करता है।
जिस घरमें लिखकर यह सम्पूर्ण स्तोत्र सदैव रखा रहता है, वहाँ श्राद्ध करनेपर हमारी उपस्थिति विद्यमान रहती है अर्थात् उस श्राद्धमें हम लोग उपस्थित रहते हैं। हे महाभाग! इसलिये श्राद्धमें भोजन करते हुए ब्राह्मणोंके सामने हम लोगोंको तृप्ति प्रदान करनेवाले इस स्तोत्रको सुनाना चाहिये<sup>२</sup>।
(अध्याय ८९)
प्रम्लोचा नामक अप्सराकी दिव्य कन्या मानिनीसे प्रजापति रुचिका विवाह
**मार्कण्डेय मुनिने कहा—**पितरोंकी कृपासे उसी समय उस नदीके मध्यसे ही रुचिके समीप प्रम्लोचा नामकी मनको प्रिय लगनेवाली कृशाङ्गी, सुन्दर श्रेष्ठ एक अप्सरा प्रकट हुई। उस श्रेष्ठ अप्सराने प्रिय एवं
१-स्तोत्रेणानेन च नरो योऽस्मांस्तोष्यति भक्तितः। तस्य तुष्टा वयं भोगानात्मजं ध्यानमुत्तमम्॥
आयुरारोग्यमर्थं च पुत्रपौत्रादिकं तथा। वाञ्छद्भिः सततं स्तव्याः स्तोत्रेणानेन वै यतः॥
श्राद्धेषु य इमं भक्त्या त्वस्मत्प्रीतिकरं स्तवम्। पठिष्यति द्विजाग्र्याणां भुञ्जतां पुरतः स्थितः॥
स्तोत्रश्रवणसंप्रीत्या संनिधाने परे कृते। अस्माभिरक्षयं श्राद्धं तद्भविष्यत्यसंशयम्॥ (८९।७०-७३)
२-यस्मिन् गेहे च लिखितमेतत्तिष्ठति नित्यदा। संनिधाने कृते श्राद्धे तत्रास्माकं भविष्यति॥
तस्मादेतत्त्वया श्राद्धे विप्राणां भुञ्जतां पुरः। श्रावणीयं महाभाग अस्माकं पुष्टिकार्कम्॥ (८९।८२-८३)