भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१५६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

भगवान् विष्णुका ध्यान करके उन सभी ऋषियोंसे धर्मसम्बन्धित विषयका वर्णन करने लगे।

याज्ञवल्क्यजीने कहा—जिस देशमें कृष्णसार नामक मृग विचरण करते हैं, मैं उस देशके धर्मादिक विषयोंका वर्णन करता हूँ, आप सब सुनें।

पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, छन्द एवं ज्योतिषके सहित चार वेद—ये धर्म तथा चौदह विद्याओंके स्थान हैं। मनु, विष्णु, यम, अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त, शातातप, पराशर, आपस्तम्ब, उशना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, गौतम, शंख-लिखित, हारीत और अत्रिके साथ मैं स्वयं—हम सब भगवान् विष्णुका ध्यान करके धर्मोपदेशक हुए।

धर्मका अर्थ है—पुण्य। पुण्यकी उत्पत्तिके हेतु हैं—शास्त्रविहित देशमें, शास्त्रविहित कालमें, शास्त्रविहित उपायसे श्रद्धापूर्वक योग्य पात्र (विद्या एवं तपसे समृद्ध ब्राह्मण)-को दिया गया दान तथा इसके अतिरिक्त अन्य सभी शास्त्रोक्त कर्म। इन्हें अलग-अलग तथा समूहरूपमें धर्म (पुण्य)-का उत्पादक समझना चाहिये। धर्मके उत्पादक इन हेतुओंका मुख्य फल (परम धर्म) योग (चित्तवृत्तिनिरोध)-के द्वारा आत्मदर्शन (आत्माका साक्षात्कार) ही है। इस आत्मदर्शनरूप परम धर्मके लिये देश आदिका कोई नियम नहीं है। चित्तवृत्तिनिरोध (योग) होनेसे यह होता ही है। चित्तवृत्तिनिरोधके लिये विहित उपायोंके अनुष्ठानकी सम्पन्नतामें देश आदिका नियम आवश्यक है। अभी धर्मके उत्पादक जिन हेतुओंका निर्देश किया गया है, उनके बारेमें संदेह होनेपर निर्णय प्राप्त करनेके लिये परिषद् (धर्मसभा)-का सहयोग लेना चाहिये। यह परिषद् वेदों एवं धर्मशास्त्रोंके ज्ञाता चार ब्राह्मणोंकी अथवा तीन ब्राह्मणोंकी होती है। इस परिषद्का निर्णय धर्मके सम्बन्धमें मान्य होता है। ब्रह्मवेत्ता—वेद एवं धर्मशास्त्रका विज्ञ एक ब्राह्मण भी धर्मके विषयमें उत्पन्न संदेहका निराकरण कर सकता है।

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चार वर्ण हैं। इनमें प्रारम्भके तीन वर्ण द्विज कहलाते हैं। गर्भाधानसे लेकर श्मशानपर्यन्त ऐसे द्विजोंकी समस्त क्रियाएँ मन्त्रोंके द्वारा होती हैं।

गर्भाधान-संस्कार ऋतुकालमें* होता है। गर्भस्पन्दन होनेसे पूर्व ही पुंसवन-संस्कार किया जाता है। गर्भाधानके छठे अथवा आठवें मासमें सीमन्तोन्नयन-संस्कार होता है। सन्तानोत्पत्तिके बाद जातकर्म और ग्यारहवें दिन नामकरण-संस्कार करनेका विधान है। चतुर्थ मासमें निष्क्रमण तथा छठे मासमें अन्नप्राशन-संस्कार करना चाहिये। उसके बाद कुल-परम्पराके अनुसार चूडाकरण नामक संस्कार करनेका विधान है।

इस प्रकार सन्तानके लिये विहित उक्त संस्कारोंको करनेसे बीज (शुक्र) तथा गर्भ (शोणित)-के कारण उत्पन्न हुए सभी पाप शान्त हो जाते हैं। स्त्रियोंकी ये सभी क्रियाएँ (संस्कार) अमन्त्रक होती हैं और विवाह-संस्कार समन्त्रक होता है। (अध्याय ९३)


* स्त्रियोंका वह कालविशेष ऋतुकाल है, जो गर्भ धारणके योग्य अवस्थाविशेषसे युक्त है। यह विशेष काल रजोदर्शनके दिनसे सोलह अहोरात्रका होता है। इन सोलह अहोरात्रोंमें प्रथम चार रात्रियाँ गर्भाधानके लिये वर्जित हैं; अतः इन चार रात्रियोंके बादकी बारह रात्रियाँ ही गर्भाधानके लिये विहित हैं।