भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 196, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 196
१८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

यदि किसी कारण ब्राह्मण कृषि आदिसे भी अपने जीवनकी रक्षा न कर सके तो तीन दिन बुभुक्षित ही रहे। तदनन्तर ब्राह्मणके अतिरिक्त और किसीके यहाँसे केवल एक दिनके लिये धान्य प्राप्त करे तथा अब्राह्मणसे प्राप्त इस धान्यका उपभोग करते समय वह प्रकाशित भी करे कि मैंने अब्राह्मणसे धान्य लेकर आज जीवन-निर्वाह किया है। ऐसे वृत्तिसंकरसे ग्रस्त ब्राह्मणके वृत्त, कुल, रीति, शास्त्राध्ययन, वेदाध्ययन और तप आदि विशेषताओंको जानकर राजाका यह कर्तव्य होता है कि वह उस ब्राह्मणके लिये धर्मानुकूल जीवन-यापनकी व्यवस्था करे। (अध्याय १०६)


महर्षि पराशरप्रोक्त वर्ण तथा आश्रम-धर्म एवं प्रायश्चित्त-धर्मका निरूपण

सूतजीने कहा—महर्षि पराशरने वेदव्यासजीसे वर्णाश्रमादिके धर्मका वर्णन किया था। [उनका यही कहना है कि] कल्प-कल्पमें उत्पत्ति और विनाशके कारण प्रजाएँ आदि क्षीण होती रहती हैं। कल्पके प्रारम्भमें मन्वादि ऋषि वेदोंका स्मरण करके ब्राह्मणादि वर्णोंके धर्मोंका पुनः निरूपण करते हैं।

कलियुगमें दान ही धर्म है। कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका परित्याग करना चाहिये<sup></sup>। कलियुगमें पाप तथा शाप—ये दोनों एक वर्षमें फलीभूत हो जाते हैं।

मनुष्य आचार (सदाचार तथा शौचाचार)-से ही सब कुछ प्राप्त करे। संध्या, स्नान, जप, होम, देव और अतिथिपूजन—इन षट्कर्मोंको प्रतिदिन करना चाहिये। आचारवान् ब्राह्मण तथा संन्यासी इस कलियुगमें दुर्लभ हैं। क्षत्रियको चाहिये कि वह शत्रुसेनाओंको जीतकर पृथिवीका भलीभाँति पालन करे। वैश्य कृषि एवं पशुपालन तथा व्यापारादि करे और शूद्र इन तीन द्विजवर्णोंकी सेवामें अनुरक्त रहे। व्यक्तिका पतन अभक्ष्य-भक्षण (शास्त्र-निषिद्ध भोजन), चोरी और अगम्यागमन करनेसे हो जाता है। यदि द्विज कृषिकार्य करता है तो वह थके हुए बैलसे हल न खिंचे तथा उसे भार ढोनेके कार्यमें नियोजित न करे। स्नान और योगादि कार्योंसे निवृत्त होकर पञ्चयज्ञ करे। मध्याह्नकालमें ब्राह्मणोंको भोजन कराये और क्रूरकर्मोंकी निन्दा करे।

तिल तथा घृतका विक्रय नहीं करना चाहिये। पञ्चसूनाजनित<sup></sup> दोषके निवारणार्थ [बलिवैश्वदेव] होम करे। कृषिकर्ता द्विजद्वारा अपनी उपजका क्रमशः छठा भाग राजा, बीसवाँ भाग देवता और तैंतीसवाँ भाग ब्राह्मणोंको देय है, इससे (कृषिजनित) पाप नहीं लगता। कृषिकार्य करनेवाले क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र यदि खलिहानमें उक्त निर्धारित भाग राजा आदिको प्रदान नहीं करते हैं तो वे चोरके समान पापके भागी होते हैं।

मृत्युका अशौच होनेपर [सामान्यतः] ब्राह्मण तीन दिनके पश्चात् शुद्ध हो जाता है<sup></sup>। इसी प्रकार


<sup></sup>—त्यजेद्देशं कृतयुगे त्रेतायां ग्राममुत्सृजेत्। द्वापरे कुलमेकं तु कर्तारं तु कलौ युगे ॥
‘सत्ययुगमें जिस देशमें पाप होता हो उस देशका, त्रेतामें जिस ग्राममें पाप होता हो उस ग्रामका, द्वापरमें जिस कुलमें पाप होता हो उस कुलका और कलियुगमें केवल पाप करनेवालेका त्याग कर देना चाहिये।’
<sup></sup>—सूनाका अर्थ है—पशुके वधका स्थान। यहाँ सूनाका अर्थ है—हिंसाका स्थान। गृहस्थके घरमें हिंसाके पाँच स्थान होते हैं—चूल्हा, पेषणी (कूटने-पीसनेका साधन, खल-बट्टा, सिल आदि), मार्जनी (झाडू आदि), ऊखल, मूसल और जलका कलश—ये ही पाँच सूना हैं।
<sup></sup>—यहाँपर ब्राह्मण आदिकी अशौच-निवृत्तिके लिये दो प्रकारके वचन दिये गये हैं। पहलेके अनुसार तीन दिनमें तथा दूसरेके अनुसार दस दिनमें शुद्धि लिखी है। कलियुगमें दूसरा वचन ही मानकर अशौच-निवृत्तिकी व्यवस्था समझनी चाहिये।