गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार १९
कारण यक्षोंको यक्ष*-नामकी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। तदनन्तर ब्रह्माके केशोंसे सर्प उत्पन्न हुए। ब्रह्माके केश उनके सिरसे नीचे गिरकर पुनः उनके सिरपर आरूढ हो गये—यही सर्पण है। इसी सर्पण (गतिविरोध)-के कारण उन्हें सर्प कहा गया। उसके बाद ब्रह्माके क्रोधसे भूतोंका जन्म हुआ। (इसीलिये इन प्राणियोंमें क्रोधकी मात्रा अधिक होती है।) तदनन्तर ब्रह्मासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई। गायन करते हुए इन सभीका जन्म हुआ था, इसलिये इन्हें गन्धर्व और अप्सराकी ख्याति प्राप्त हुई।
उसके बाद प्रजापति ब्रह्माके वक्षःस्थलसे स्वर्ग और द्युलोक उत्पन्न हुआ। उनके मुखसे अज, उदर-भागसे तथा पार्श्व-भागसे गौ, पैर-भागसे हाथीसहित अश्व, महिष, ऊँट और भेड़की उत्पत्ति हुई। उनके रोमोंसे फल-फूल एवं औषधियोंका प्रादुर्भाव हुआ।
गौ, अज, पुरुष—ये मेध्य (पवित्र) हैं। घोड़े, खच्चर और गदहे ग्राम्य पशु कहे जाते हैं। अब मुझसे वन्य पशुओंको सुनो—इन वन्य जन्तुओंमें पहले श्वापद (हिंसक व्याघ्रादि) पशु, दूसरे दो खुरोंवाले, तीसरे हाथी, चौथे बंदर, पाँचवें पक्षी, छठे कच्छपादि जलचर और सातवें सरीसृप जीव (उत्पन्न हुए) हैं।
उन ब्रह्माके पूर्वादि चारों मुखोंसे ऋक्, यजुष्, साम तथा अथर्व—इन चार वेदोंका प्रादुर्भाव हुआ। उन्हींके मुखसे ब्राह्मण, भुजाओंसे क्षत्रिय, उरु-भागसे वैश्य तथा पैरोंसे शूद्र उत्पन्न हुए। उसके बाद उन्होंने ब्राह्मणोंके लिये ब्रह्मलोक, क्षत्रियोंके लिये इन्द्रलोक, वैश्योंके लिये वायुलोक और शूद्रोंके लिये गन्धर्वलोकका निर्धारण किया। उन्होंने ही ब्रह्मचारियोंके लिये ब्रह्मलोक, स्वधर्मनिरत गृहस्थाश्रमका पालन करनेवाले लोगोंके लिये प्राजापत्यलोक, वानप्रस्थाश्रमियोंके लिये सप्तर्षिलोक और संन्यासी तथा इच्छानुकूल सदैव विचरण करनेवाले परम तपोनिधियोंके लिये अक्षयलोकका निर्धारण किया। (अध्याय ४)
मानस-सृष्टि-वर्णन, दक्ष प्रजापतिद्वारा मिथुनधर्मसे सृष्टिका विस्तार
**श्रीहरिने पुनः कहा—**हे रुद्र ! प्रजापति ब्रह्माने परलोकमें रहनेवाली मानस-प्रजाओंकी सृष्टिके अनन्तर सृष्टि-विस्तार करनेवाले मानस-पुत्रोंकी सृष्टि की। उनसे धर्म, रुद्र, मनु, सनक, सनातन, भृगु, सनत्कुमार, रुचि, श्रद्धा, मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, वसिष्ठ और नारदका प्रादुर्भाव हुआ। साथ ही बर्हिषद्, अग्निष्वात्त, क्रव्याद, आज्यप, सुकालिन, उपहूत एवं दीप्य नामक (सात पितृगण) उत्पन्न हुए। इन बर्हिषदादि सप्त पितृगणोंमें प्रथम तीन पितृगण अमूर्तरूप और शेष चार मूर्तिमान् हैं।
कमलयोनि ब्रह्माके दक्षिण अँगूठेसे ऐश्वर्यसम्पन्न दक्ष प्रजापति और वाम अँगूठेसे उनकी भार्याका जन्म हुआ। प्रजापतिने अपनी उस पत्नीके गर्भसे अनेक शुभ लक्षणोंवाली कन्याओंको उत्पन्न किया और उन्हें ब्रह्माके मानस पुत्रोंको समर्पित कर दिया। उन्होंने सती नामक पुत्रीका विवाह रुद्रके साथ किया, उनसे रुद्रके असंख्य महापराक्रमशाली पुत्रोंकी उत्पत्ति हुई।
दक्षने असाधारण रूपवती सुन्दर लक्षणोंवाली
* यक्ष धनके देवता हैं। ये धनके लिये पूज्य होते हैं। भक्षण पूजाका एक भाग है। यक्ष धन प्रदान करनेके लिये धनकी कामना करनेवालोंसे भक्षणकी अपेक्षा रखते हैं, इसी दृष्टिसे भक्षणके आधारपर यक्ष नाम समझना चाहिये। यक्षका अर्थ पूजा भी हो सकता है। इसके लिये ऋग्वेद (७।६१।५)-का सायणभाष्य भी द्रष्टव्य है।