भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished634 पृष्ठ

पृष्ठ 226, कुल 634 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 226
२१६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

कुब्ज होना, कृमिदोषसे पीड़ित रहना, वायुविकारसे ग्रस्त होना, देश, राज्य या गृहसे निष्कासित हो जाना तथा पर्वतके शिखर-भागमें रहना अच्छा है, किंतु याचनाकी वृत्तिको स्वीकार करना उचित नहीं है। संसारके स्वामी होनेपर भी भगवान् विष्णु बलिके यहाँ याचना करके वामन (बौने) हो गये थे। उनसे बढ़कर और कौन ऐसा है, जो याचक होकर लघुताको प्राप्त नहीं होगा?<sup></sup>

वे माता-पिता उस बालकके शत्रु होते हैं, जिन्होंने उसे विद्याध्ययन नहीं कराया है। सभाके मध्य मूर्ख वैसे ही शोभा प्राप्त करनेमें सफल नहीं होता, जैसे हंस-समुदायके मध्य बगुला सुशोभित नहीं होता।

विद्या कुरूप व्यक्तिके लिये भी रूप है। विद्या अत्यधिक गुप्त धन है। विद्या प्राणीको साधुवृत्तिवाला तथा सभी लोगोंका प्रियपात्र बना देती है। वह गुरुओंकी भी गुरु है। विद्या बन्धु-बान्धवोंके कष्टोंको दूर करनेवाली है। विद्या परम देवता है। विद्या राजाओंके मध्य पूजनीय है। अतः विद्यासे विहीन मनुष्य पशुके समान है—

विद्या नाम कुरूपरूपमधिकं विद्यातिगुप्तं धनं
विद्या साधुकरी जनप्रियकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनार्तिनाशनकरी विद्या परं दैवतं
विद्या राजसु पूजिता हि मनुजो विद्याविहीनः पशुः॥
(११५।८१)

घर या उसके गुह्य स्थानोंपर सुरक्षित रखा हुआ द्रव्य देखा जा सकता है और वह समस्त धन-वैभव चोरोंके द्वारा चुराया भी जा सकता है। किंतु विद्या एक ऐसा धन है, जो दूसरेके द्वारा किसी भी प्रकार अपहृत नहीं किया जा सकता।<sup></sup>

(अध्याय ११५)


तिथि आदि व्रतोंका वर्णन

ब्रह्माजीने कहा— हे व्यास! अब मैं व्रतोंका वर्णन करूँगा, जिनको करनेसे प्राणीको भगवान् हरि सब कुछ प्रदान करते हैं। सभी मास, सभी नक्षत्र, सभी तिथि और सभी दिनोंमें हरिका पूजन होता है। एकभक्त<sup></sup>, नक्त<sup></sup>, उपवास अथवा फलाहारव्रत करनेसे व्रतीको भगवान् हरि धन, धान्य, पुत्र, राज्य और विजय आदि प्रदान करते हैं।

प्रतिपदा तिथिमें वैश्वानर तथा कुबेर पूज्य हैं, वे साधकको अर्थलाभ कराते हैं। प्रतिपदा तिथिमें तथा अश्विनी नक्षत्रमें उपवास करनेवाले साधकके द्वारा पूजित ब्रह्मा उसे लक्ष्मी प्रदान करते हैं।

द्वितीया तिथिमें यमराज एवं भगवान् लक्ष्मीनारायण उस व्रतीको अर्थलाभ कराते हैं। तृतीया तिथिमें गौरी, विघ्नविनाशक गणेश तथा शिव—ये तीन देव पूज्य हैं। चतुर्थीको चतुर्व्यूह भगवान् विष्णु, पञ्चमीको हरि, षष्ठीको कार्तिकेय और रवि तथा सप्तमीको भगवान् भास्करकी पूजा करनी चाहिये। ये उपासकको अर्थलाभ कराते हैं।


१-जगत्पतिर्हि याचित्वा विष्णुर्वामनतां यतः। कोऽन्योऽधिकतरस्तस्य योऽर्थी याति न लाघवम्॥ (११५।७९)
२-गृहे चाभ्यन्तरे द्रव्यं लग्नं चैव तु दृश्यते। अशेषं हरणीयं च विद्या न ह्रियते परैः॥ (११५।८२)
३-दिनार्धसमयेऽतीते भुज्यते नियमेन यत्। एकभक्तमिति प्रोक्तं रात्रौ तन्न कदाचन॥
दिनका आधा समय बीत जानेपर २४ घंटेमें केवल एक बार दिनमें किया गया भोजन एकभक्त होता है।
४-दिवसस्याष्टमे भागे मन्दीभूते दिवाकरे। नक्तं तच्च विजानीयान्न नक्तं निशिभोजनम्॥
नक्षत्रदर्शनान्नक्तं गृहस्थेन विधीयते। यतेर्दिनाष्टमे भागे रात्रौ तस्य निषेधनम्॥
दिनके आठवें भागमें सूर्यप्रभाके मन्द होनेपर किया गया २४ घंटेमें एक बारका भोजन नक्तव्रत है। गृहस्थके लिये सूर्यास्तके अनन्तर नक्षत्र-दर्शन करके भोजन करना नक्तव्रत है और यति (संन्यासी)-के लिये सूर्यास्तके पूर्व दिनके आठवें भागमें भिक्षा ग्रहण करना नक्तव्रत है।