गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २२८ | संक्षिप्त गरुडपुराण | [ आचार- |
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गन्ध, पुष्प, माला आदिसे ब्रह्माकी पूजा और हवन करनेसे सभी अभीष्ट फलोंकी प्राप्ति होती है। कार्तिकमासमें शुक्लपक्षकी अष्टमी तिथिको व्रती पुष्प और उनसे बनी हुई मालाका दान करे। यह क्रम वर्षपर्यन्त चलना चाहिये। ऐसा करनेसे रूपकी इच्छा करनेवाले व्रतीको रूप-सौन्दर्यकी प्राप्ति होती है।
श्रावणमासके कृष्णपक्षकी तृतीया तिथिमें लक्ष्मीके साथ भगवान् श्रीधरविष्णुको सुसज्जित शय्यापर स्थापित कर उनकी पूजा करे और फलकी भेंट चढ़ाये। इसके बाद उस शय्यादिका दान ब्राह्मणको करके व्रती 'श्रीधराय नमः, श्रियै नमः' यह प्रार्थना करे। इसी तृतीया तिथिको उमा-शिव और अग्निकी पूजा करनी चाहिये। व्रती इन सभीको हविष्यान्न, नैवेद्य और दमनक (श्वेत कमल)-का निवेदन करे।
फाल्गुनादिमें तृतीयाका व्रत करनेवाले मनुष्यको नमक नहीं खाना चाहिये। व्रतके समाप्त होनेपर सपत्नीक ब्राह्मणकी पूजा करके अन्न, शय्या, पात्रादि उपस्करोंसे युक्त घरका दान 'भवानी प्रीयताम्' 'भवानी प्रसन्न हों' ऐसा कहकर करना चाहिये। ऐसा करनेसे व्रतीको अन्त समयमें भवानीका लोक प्राप्त होता है और इस लोकमें श्रेष्ठ सुख तथा सौभाग्यकी प्राप्ति होती है।
मार्गशीर्षमासकी तृतीया तिथिमें गौरी तथा चतुर्थी आदि तिथियोंमें क्रमशः—काली, उमा, भद्रा, दुर्गा, कान्ति, सरस्वती, मंगला, वैष्णवी, लक्ष्मी, शिवा तथा नारायणीदेवीकी पूजा करनी चाहिये। इनकी पूजा करनेसे व्रती प्रियजनोंसे होनेवाले वियोगादि कष्टोंसे मुक्त हो जाता है।
माघमासके शुक्लपक्षमें चतुर्थी तिथिको निराहार रहकर व्रत करते हुए व्रती ब्राह्मणको तिलका दानकर स्वयं तिल एवं जलका आहार करे। इस प्रकार प्रतिमास व्रत करते हुए दो वर्ष बीतनेपर इस व्रतको समाप्त कर देना चाहिये। ऐसा करनेसे जीवनमें किसी प्रकारका विघ्न आदि प्राप्त नहीं होता। चतुर्थी तिथिमें गणोंके अधिनायक गणपतिदेवकी यथाविधि पूजा करनी चाहिये—पूजामें 'ॐ गः स्वाहा' यह प्रणवसे युक्त मूल मन्त्र है। पूजामें अङ्गन्यास इस प्रकारसे करना चाहिये—
ॐ ग्लौं ग्लां हृदयाय नमः (दाहिने हाथकी पाँचों अँगुलियोंसे हृदयका स्पर्श)। ॐ गां गीं गूं शिरसे स्वाहा (सिरका स्पर्श)। ॐ हूं हीं हीं शिखायै वषट् (शिखाका स्पर्श)। ॐ गूं कवचाय वर्मणे हुम् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंसे बायें कंधेका और बायें हाथकी अँगुलियोंसे दाहिने कंधेका साथ ही स्पर्श)। ॐ गौं नेत्रत्रयाय वौषट् (दाहिने हाथकी अँगुलियोंके अग्रभागसे दोनों नेत्रों और ललाटके मध्यभागका स्पर्श)। ॐ गों अस्त्राय फट् (यह वाक्य पढ़कर दाहिने हाथको सिरके ऊपरसे बायीं ओरसे पीछेकी ओर ले जाकर दाहिनी ओरसे आगेकी ओर ले आये और तर्जनी तथा मध्यमा अँगुलियोंसे बायें हाथकी हथेलीपर ताली बजाये)।
आवाहनादिमें निम्नाङ्कित मन्त्रोंका प्रयोग करना चाहिये। यथा—
आगच्छोल्काय गन्धोल्कः पुष्पोल्को धूपकोल्ककः।
दीपोल्काय महोल्काय बलिश्चाथ विस (मा) र्जनम्॥
हे गन्धोल्क, हे पुष्पोल्क, हे धूपकोल्क अर्थात् हे गन्ध, पुष्प तथा धूपमें तेजःस्वरूप विद्यमान रहनेवाले देव! आप इस रचित पूजामण्डलमें स्थित दीपकमें तेज प्रदान करनेके लिये, महातेज देनेके लिये, बलि और विसर्जनतक विद्यमान रहनेके लिये यहाँ उपस्थित हों।
आवाहनके पश्चात् गायत्रीमन्त्रसे अंगुष्ठादिका न्यास करना चाहिये। वह गायत्रीमन्त्र इस प्रकार है—