भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य २३३


बैलको लेकर गङ्गामें स्नान करते समय जलक्रीडा करने लगा और उसी समय चोर गोपालकोंने आकर बलात् उस धनपाल नामक बैलका अपहरण कर लिया। कौशिक दुःखी होकर वनमें भ्रमण करने लगा। उसी समय संयोगवश अपनी माताके साथ गङ्गाजल लेनेके लिये विजया वहींपर आ गयी। कौशिक भूख-प्याससे व्याकुल हो कमलनालको भक्षण करनेकी इच्छासे एक जलाशयके पास जा पहुँचा। जहाँपर दिव्यलोककी कुछ स्त्रियाँ पूजा कर रही थीं। उन्हें देखकर उसके आश्चर्यका ठिकाना न रहा। अतः विस्मयाभिभूत कौशिकने उन सबके पास जाकर कुछ अन्नके लिये याचना करते हुए कहा—मैं अपनी छोटी बहनके साथ भूखा हूँ, किंतु स्त्रियोंने कहा कि तुमको इस पूजन-सामग्रीमेंसे व्रत करनेके लिये ही कुछ द्रव्य मिल सकता है। तुम भी यहींपर व्रत करो। तत्पश्चात् कौशिकने वहींपर धनपाल बैलकी प्राप्तिके लिये और विजयाने पति-प्राप्तिके लिये बुधदेवकी व्रत-पूजा की। व्रत-पूजन करनेके पश्चात् स्त्रियोंके द्वारा दोनेमें दिये गये प्रसादको उन दोनोंने ग्रहण किया। उसके बाद वे स्त्रियाँ वहाँसे चली गयीं। कुछ समयके बाद चोरोंके साथ वहींपर धनपाल बैल भी दिखायी पड़ गया। चोरोंके द्वारा दिये हुए धनपाल बैलको लेकर प्रदोषकालमें वे दोनों घर वापस चले आये। घरमें दुःखित पिता वीरको प्रणामकर रात्रिमें कौशिक सुखपूर्वक सो गया।

इधर युवा हुई पुत्री विजयाको देखकर वीरको यह चिंता हो गयी कि मैं इस पुत्रीको किसे दूँ। दुःखित पिताने यमराजको पुत्री देनेका निश्चय किया। दैवयोगसे इसी बीच वीरकी मृत्यु हो गयी। पिताके स्वर्ग चले जानेके बाद कौशिकने राज्य-प्राप्तिके लिये पुनः बुधाष्टमीका व्रत किया, जिसके फलस्वरूप कौशिकको अयोध्याका विशाल राज्य प्राप्त हुआ। उसने अपनी उस बहन विजयाका विवाह भी पिताके द्वारा कहे गये वचनके अनुसार यमराजके साथ ही करनेकी बात मनमें ठान ली थी। व्रतके प्रभावसे यमराजने वहाँ स्वयं आकर विजयाको पत्नीके रूपमें स्वीकार किया और विजयासे कहा—'तुम चलकर मेरे घरमें गृहस्वामिनी बनकर रहो।' उसने भी वैसा ही स्वीकार कर लिया और पतिके घर जाकर रहने लगी। एक दिन यमने उसे सावधान करते हुए कहा—देवि! ये जो बंद कमरे हैं, इन्हें कभी खोलना नहीं। विजयाने कभी भी बंद कमरेका किंवाड़तक नहीं खोला और न तो अपने पतिके विरुद्ध कोई आचरण ही किया। वह एक सद्गृहिणीके समान ही उनके साथ रही, किंतु एक दिन जिज्ञासावश उसने पतिके न रहनेपर कमरा खोलनेपर वहाँ अपनी माताको पति यमके ही कष्टकारी पाशमें बँधा हुआ देखा, जिससे वह अत्यन्त दुःखित हो उठी। उसी समय कौशिकके द्वारा बताये गये मुक्ति प्रदान करनेवाले बुधाष्टमी-व्रतकी याद उसे हो आयी। अतः उसने पुनः उस व्रतको किया, जिसके फलस्वरूप माता उस यमपाशसे मुक्त हो गयी। तदनन्तर उसने भी उस व्रतका पालन किया और अन्तमें व्रतके पुण्यके प्रभावसे स्वर्गलोक प्राप्तकर वहाँ सुखपूर्वक निवास करने लगी।
(अध्याय १३२)


अशोकाष्टमी, महानवमी तथा नवमीके अन्य व्रत और ऋष्येकादशी व्रत-माहात्म्य

**ब्रह्माजीने कहा—**चैत्रमासमें पुनर्वसु नक्षत्रसे युक्त शुक्लाष्टमीको 'अशोकाष्टमी' व्रत होता है, इस दिन जो अशोकमञ्जरीकी आठ कलियोंका पान करते हैं, वे शोकको नहीं प्राप्त होते। अशोककलिकाओंका पान करते समय यह प्रार्थना करनी चाहिये—