भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] ज्वर-निदान २५७


ज्वर तीक्ष्ण होता है। अन्तराश्रयज्वरमें अन्तर्विकार अधिक होते हैं तथा तीव्र दाह और मल-मूत्रादिका विबन्ध होता है, बहिराश्रयज्वरमें केवल बाहरी ताप होता है। इसमें तीव्र दाह और मल आदिकी विबन्धता नहीं होती, इसलिये बहिराश्रय-ज्वर सुख-साध्य और अन्तराश्रयज्वर दुःसाध्य होता है।

वर्षा, शरद् तथा वसन्त-ऋतुओंमें वात-पित्त और कफके प्रभावसे जो ज्वर उत्पन्न होता है, उसे प्राकृत-ज्वर कहा जाता है (यथा वर्षाकालमें वातिक, शरत्कालमें पैत्तिक एवं वसन्तकालमें श्लैष्मिक ज्वरका प्राकृतिक प्रभाव रहता है।), वह साध्य है। इस वैकृत ज्वरका जो विपरीत रूप है, वह दुःसाध्य माना गया है। प्राकृतिक ज्वर प्रायः वायुदोषके कारण होता है, यह भी दुःसाध्य है। वायु वर्षाकालमें दोषयुक्त हो जाती है, उसके प्रभावके कारण पित्त एवं कफसे समन्वित ज्वर प्राणियोंमें होता है। शरत्कालमें पित्त-दोषजन्य ज्वरकी उत्पत्ति होती है। इस कालमें पित्त-दोषका अनुगमन कफ करता रहता है, इसलिये इस कालके ज्वरमें पित्त एवं कफ दोनों मिलकर रोगीको कष्ट देते हैं। इस प्राकृतिक ज्वरसे मुक्ति प्राप्त करनेके लिये भोजन न करनेसे रोगीको किसी अन्य रोगका भय नहीं रहता है। वसन्तकालमें कफ कुपित होकर ज्वर उत्पन्न करता है। उसके पीछे ही वात एवं पित्तके दोष भी लगे रहते हैं। इस ज्वरमें उपवाससे हानि हो सकती है।

यदि रोगी बलवान् हो और ज्वर अल्प दोषसे उत्पन्न हुआ हो तथा कासादि दोष उपद्रवोंसे रहित हो तो सुख-साध्य होता है। जैसे रोगीको जैसा ज्वर असाध्य होता है वह पहले बताया गया है। इसका उपद्रव हो जानेपर रोगीमें चिड़चिड़ापन, मन्दाग्नि, बहुमूत्रता, अरुचि, अजीर्ण तथा भूख न लगनेके लक्षण उभर आते हैं, यही सामज्वर है।

तेज ज्वर होनेपर अधिक प्यास-प्रलाप, श्वास तथा चक्कर आता है। नाक-कान, मुँह तथा गुदाभागसे मल निकलनेकी गति तेज होती है। उत्क्लेश होता है, जिससे रोगीको कष्ट होता है। यह पच्यमान-ज्वरका लक्षण है। सामज्वरसे विपरीत लक्षण होनेपर सात दिनका लंघन करना चाहिये, क्योंकि आठवें दिन ज्वर निराम हो जाता है।

मल<sup></sup>, काल तथा बलाबलके कारण ज्वर पाँच प्रकारका कहा गया है। यथा—निरन्तर विद्यमान रहनेवाला, सततवाही ज्वर, दूसरे दिनतक रहनेवाला ज्वर, तीसरे और चौथे—चार दिनतक रहनेवाला। विशेषतः ये ज्वर सन्निपातसे ही होते हैं। इस ज्वरमें धातु-मूत्र और विष्ठाको शरीरसे बाहर निकालनेवाले मार्ग मलव्यापी हो जाते हैं। इस समय वे सभी दूषित होकर एक समान ही सम्पूर्ण शरीरको संतप्त करते हैं तथा दूष्य पदार्थों, देश, ऋतु और प्रकृतिद्वारा बढ़कर और बलवान् भारी तथा स्तब्ध होकर रसादिके आश्रित हो जाते हैं तथा प्रतिद्वन्द्वितासे रहित होकर वातादि दोष दुःसह संतत-ज्वरको उत्पन्न करते हैं। अनल-धर्म-ज्वरकी गर्मी, कभी मल और कभी धातुओंका शीघ्र ही क्षय कर देते हैं।

मल<sup></sup> और धातुओंके क्षयके कारणसे रसादि सप्त धातु, मल, मूत्र और तीनों दोष—इन बारह पदार्थोंको ज्वरकी ऊष्मा सर्वाकार निःशेष करके कफकी अधिकतासे उत्पन्न हुआ यह संतत-ज्वर सात, दस या बारह दिनमें या तो रोगीको छोड़ देता है या मार डालता है, यह अग्निवेशका मत है। इस विषयमें हारीतका यह मत है कि रोगीकी नीरोगता तथा मृत्युके लिये चौदह, अठारह तथा बाईस दिनतक त्रिदोषकी मर्यादा होती है।

धातुजन्य<sup></sup> शुद्धता अथवा अशुद्धताके कारण यह संतत-ज्वर प्राणीके शरीरमें अधिक समयतक


१-अ०हृ०नि०अ० २-५, ६-५९, सु०उ०अ० ३९। २-अ०हृ०नि०अ० २, च०चि०अ० ३, ५३-७३। ३-अ०हृ०नि०अ० २-६३-६६। च०चि०अ० ३, सु०उ०अ० ३९।