भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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काण्ड ] ज्वर-निदान २५९


प्रभाव भी शरीरपर दूसरी रीतिसे पड़ता है।

वाय्वाधिक्यसे सिरमें वेदना होती है। कफाधिक्यसे जंघामें प्रारम्भ होती है। उक्त सिर एवं जंघामें वेदना होकर ही ज्वर चढ़ता है।

तदनन्तर वह अस्थि एवं मज्जामें जाकर अवस्थित होता है। इसी कारण इसको चतुर्थक ज्वरका विपर्यय<sup></sup> (दूसरा) रूप माना जाता है। यह ज्वर अपने संतापकालमें एक दिनका अन्तराल करके रोगीपर तीन दिनतक तीन प्रकारसे आक्रमण करता है। यह अस्थि और मज्जा—इन दो धातुओंमें आश्रित होनेके कारण लगातार तीन दिनतक रहकर बीचमें एक दिन छोड़कर आता है और फिर तीन दिन लगातार रहता है। बलाबलके प्रभावसे वात-पित्त तथा कफजन्य दोष अथवा अन्य विकृत चेष्टाओंको जन्म देनेवाले विकारोंकी परिपक्व-स्थितिके आ जानेपर रोगीको सात दिनका लंघन करना चाहिये।

इसी तरह जिस-जिस समय रजोगुण एवं तमोगुणके कारण मानस दोष और मानस कार्यका बलाबल होता है, उसी-उसी समयमें यह सततादि ज्वर उत्पन्न होकर चढ़ता-उतरता रहता है।

उस प्रत्येक कालमें रोगीके कर्मका प्रभाव दिखायी देता है। सन्निपातके द्वारा सम्भूत कारणसे गम्भीर धातुओंमें समाहित दोषोंकी प्रबलता होनेपर यह चतुर्थक ज्वर अत्यन्त कठिन चिकित्साकी अपेक्षा करने लगता है अर्थात् ज्वरका शमन, चिकित्सकके लिये दुःसाध्य हो जाता है। दूरतम देश-काल और अवस्थाके अनुसार सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूपसे ज्वरका शरीरमें जो संक्रमण होता है, रक्तादिक मार्गोंमें जो दोष बहुत समय पहलेसे धीरे-धीरे अल्पमात्रामें प्रभावी होता है, वह सम्पूर्ण शरीरमें व्याप्त नहीं होता (अतएव वह एक दिन शरीरपर अपना पूर्ण अधिकार कर लेता है) और उसी दोषके कारण वह ज्वर प्राणीमें संतापादिके कष्टोंको उत्पन्न करता है। अतः प्राणीको प्रयत्नपूर्वक यथोपचारसे उस ज्वरका विनाश कर देना चाहिये, अन्यथा वह असाध्य हो जाता है। ज्वरका सामान्य लक्षण तो यही है कि वह शरीरमें तापसे युक्त होकर अनुभूत होता है।

विषमगतिसे प्रारम्भ होनेवाला ज्वर विषम कहा जाता है। यह विषम ज्वर मध्यरात्रिकालतक अपने पूर्ण वेगमें रहता है। उसके बाद उसकी गति और शक्ति दोनों मन्द हो जाती है। उसी कालके अनुसार वह शरीरके रसादिपर अपने दोषका प्रभाव डालता है और धीरे-धीरे निष्प्रभावी होता है। ऐसा प्रकुपित दोष प्राणीको अधिकतम समयतक अस्वस्थ रखता है। जैसे भूमिमें जलसे सिंचित बीज अंकुरणके लिये समयकी प्रतीक्षा नहीं करता, वैसे ही (वात-पित्त तथा कफजन्य) दोषका बीजरूप स्वयंको शरीरमें प्रकट करनेके लिये समयकी प्रतीक्षा नहीं करता। जिस प्रकार विष वेगपूर्वक शरीरके आमाशयमें जाकर बलवान् होकर क्रुद्ध हो उठता है, उसी प्रकार शरीरमें स्थित दोष भी यथासमय शक्ति-सम्पन्न होकर स्वास्थ्यपर क्रोध करता है। इसी प्रकार सततादि ज्वर भी शरीरमें विषम भावको प्राप्त कर लेते हैं।

अधिक<sup></sup> कष्टका होना, शरीरका भारी लगना, दीनता, अङ्ग-भङ्ग (शरीरका टूटना), जँभाई, अरुचि, वमन और श्वासका फूलना आदि ये दोष सभी रसगत ज्वर होते हैं। जब ज्वर रक्तगत<sup></sup> संश्रित हो जाता है तो उस अवस्थामें रोगीको रक्तका वमन, प्यास, रूक्षता, उष्णता, शरीरपर छोटी-छोटी पीडिकाओं (दानों)-का निकलना, दाह, लालिमा, भ्रम, मद तथा प्रलापका उपद्रव


१-सु०उ०अ० ३९।
२-माधव नि० ज्वर ४८-५३।
३-सु०उ०अ० ३९, च०चि०अ० ३।

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