गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 27, कुल 634 में से
संदर्भ में पढ़ेंकाण्ड ] देवपूजा-विधान, विष्णुपूजोपयोगी वज्रनाभमण्डल २५
नमः। ॐ खं ठं फं षं गदायै नमः। ॐ वं लं मं
क्षं पाञ्चजन्याय नमः। ॐ घं ढं भं हं श्रियै नमः।
ॐ गं डं वं सं पुष्ट्यै नमः। ॐ धं षं वं सं
वनमालायै नमः। ॐ सं दं लं श्रीवत्साय नमः।
ॐ ठं चं भं यं कौस्तुभाय नमः। ॐ गुरुभ्यो
नमः। ॐ इन्द्रादिभ्यो नमः। ॐ विष्वक्सेनाय
नमः—इन मन्त्रोंसे भगवान् श्रीहरिके अवतारों,
आयुधों एवं वाहन आदिको नमस्कार करते हुए
उन्हें आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिये।
हे वृषभध्वज! भगवान् विष्णुकी शक्ति देवी
सरस्वतीकी मङ्गलकारिणी पूजामें ॐ ह्रीं सरस्वत्यै
नमः—इस मन्त्रसे देवी सरस्वतीको नमस्कारकर
निम्न मन्त्रोंसे षडङ्गन्यास करना चाहिये—
ॐ हां हृदयाय नमः। ॐ ह्रीं शिरसे नमः।
ॐ हूं शिखायै नमः। ॐ हैं कवचाय नमः। ॐ
हौं नेत्रत्रयाय नमः। ॐ ह्रः अस्त्राय नमः।
इसी प्रकार श्रद्धा, ऋद्धि, कला, मेधा, तुष्टि,
पुष्टि, प्रभा तथा मति—ये जो सरस्वतीदेवीकी
आठ शक्तियाँ हैं, इनका पूजन निम्न नाममन्त्रोंसे
करे—
ॐ ह्रीं श्रद्धायै नमः। ॐ ह्रीं ऋद्धयै नमः।
ॐ ह्रीं कलायै नमः। ॐ ह्रीं मेधायै नमः। ॐ ह्रीं
तुष्ट्यै नमः। ॐ ह्रीं पुष्ट्यै नमः। ॐ ह्रीं प्रभायै
नमः। ॐ ह्रीं मत्यै नमः।
[इन शक्तियोंकी पूजा करनेके पश्चात्] क्षेत्रपाल,
गुरु और परम गुरुका ॐ क्षेत्रपालाय नमः। ॐ
गुरुभ्यो नमः। ॐ परमगुरुभ्यो नमः—इन मन्त्रोंसे
नमस्कार करना चाहिये।
तदनन्तर कमलवासिनी सरस्वतीदेवीको
आसनादि उपचार प्रदान करने चाहिये। पूजनके
अनन्तर सूर्यादि देवताओंके लिये प्रयुक्त होनेवाले
मन्त्रोंसे उनका पवित्रारोहण करना चाहिये।
श्रीहरिने कहा—हे शिव! भगवान् विष्णुकी
विशेष पूजाके लिये पाँच प्रकारके रंगोंसे बने हुए
चूर्णके द्वारा वज्रनाभ-मण्डलका निर्माण करना
चाहिये, जो सोलह समान कोष्ठकोंसे संयुक्त हो।
वज्रनाभ-मण्डल बनाकर सबसे पहले न्यास
करे और उसके बाद भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे।
हृदयके मध्यमें भगवान् विष्णु, कण्ठमें सङ्कर्षण,
सिरपर प्रद्युम्न, शिखाभागमें अनिरुद्ध, सम्पूर्ण
शरीरमें ब्रह्मा तथा दोनों हाथोंमें श्रीधरका न्यास
करे। तत्पश्चात् ‘अहं विष्णुः’ (मैं ही विष्णु हूँ)—
ऐसा ध्यान करते हुए पद्मके कर्णिका-भागमें
भगवान् श्रीहरिकी स्थापना करे। इसी प्रकार
मण्डलके पूर्वमें सङ्कर्षण, दक्षिणमें प्रद्युम्न, पश्चिममें
अनिरुद्ध और उत्तरमें ब्रह्माकी स्थापना करे। तदनन्तर
ईशानकोणमें श्रीधर तथा पूर्वाद दिशाओंमें इन्द्रादि
देवोंकी स्थापना करनी चाहिये। यथा—पूर्व दिशामें
(ॐ इन्द्राय नमः मन्त्रसे) इन्द्र, अग्निकोणमें
(ॐ अग्नये नमः मन्त्रसे) अग्नि, दक्षिण दिशामें
(ॐ यमाय नमः मन्त्रसे) यम, नैर्ऋत्यकोणमें
(ॐ निर्ऋतये नमः मन्त्रसे) निर्ऋति, पश्चिम दिशामें
(ॐ वरुणाय नमः मन्त्रसे) वरुण, वायव्यकोणमें
(ॐ वायवे नमः मन्त्रसे) वायु, उत्तर दिशामें
(ॐ कुबेराय नमः मन्त्रसे) कुबेर और ईशानकोणमें
(ॐ ईशानाय नमः मन्त्रसे) ईशान नामक दिक्पालकी
स्थापना करे। उसके बाद उन सभी देवोंकी गन्धादि
उपचारोंके द्वारा पूजा करनी चाहिये। इससे साधक
परमपदको प्राप्त हो जाता है।
श्रीहरिने पुनः कहा—हे रुद्र! दीक्षित शिष्यको
वस्त्रसे अपने दोनों नेत्र बंद करके अग्निमें देवताके
मूलमन्त्रसे एक सौ आठ आहुतियाँ प्रदान करनी
चाहिये। हे रुद्र! पुत्र-लाभके लिये द्विगुण (दो सौ
सोलह), साधनासिद्धिके निमित्त त्रिगुण (तीन सौ
चौबीस) और मोक्ष-प्राप्तिकी कामनासे देशिक
(उपदेष्टा आचार्य)-को चाहिये कि वह चतुर्गुण