गरुड़ पुराण
Garuda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| काण्ड ] | राजयक्ष्मा-निदान | २६७ |
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इसलिये इसे 'राजयक्ष्मा' कहा गया है। यह देह और औषधि दोनोंका क्षय कर देता है तथा शरीर और औषधिका विनाश करनेवाले रोगके रूपमें यह उत्पन्न होता है, इसलिये इसका क्षय नाम दिया गया है। यह रसादि धातुओंका शोषण करनेके कारण शोष नामसे भी जाना जाता है। राजाके समान रोगोंका राजा है, जिसके कारण रोगराजके नामसे अभिहित किया गया है।
साहसके कार्य मल-मूत्रादिके वेगका बलात् अवरोध, शुक्रौज, शारीरिक स्निग्धताका विनाश तथा संयमित आहार-व्यवहारका परित्याग—ये चार इस यक्ष्मारोगकी उत्पत्तिके कारण हैं। शरीरमें उन्हीं कारणोंसे कुपित हुआ वायु पित्त एवं कफको व्यर्थमें ही कुपित कर देता है। तदनन्तर वह शरीरके संधिस्थानोंमें प्रवेश करके उनकी शिराओंको पीड़ित करता हुआ रक्त, अन्न, रसवाही आदि सभी स्रोतोंके मुखोंको बंद करता है अथवा उसी प्रकार उन सभीको छोड़कर हृदयभागमें जा पहुँचता है और उसको मध्य, ऊपर, नीचे तथा तिरछे रूपमें व्यथित करता है।
इस रोगके उत्पन्न होनेसे पूर्व रोगीको प्रतिश्याय ज्वर, लार, प्रवाह, मुखमाधुर्य, अग्निमान्द्यता तथा शारीरिक शिथिलताका दोष होता है। अन्न और पेय पदार्थके प्रति अनिच्छा तथा पवित्रतामें अपवित्रताकी प्रतीति रोगीको होती है। प्रायः उसको भोज्य एवं पेय पदार्थोंमें मक्खी, तृण और बाल गिरनेका भान होता है। रोगीका हृदय कफादिसे संश्लिष्ट हो जाता है, उसको वमन होता है। आहार-विहारके प्रति उसकी रुचि नहीं रह जाती है। भोजन करनेपर भी वह अपनेको शक्तिहीन समझता है। उसके हाथ-पैर, जंघा, वक्षःस्थल, मुख, नेत्र तथा कुक्षिभाग सूख जाते हैं। रक्तकी कमीके कारण उसका रंग श्वेत हो जाता है। उसकी भुजाओंमें विशेष प्रकारकी पीड़ा होती है। उसकी जिह्वामें भी ज्वरादिके कारण उत्पन्न हुए छालोंसे कष्ट रहता है। उसको शरीरके प्रति स्वयं घृणा होती है। उसमें स्त्रीसंसर्ग, मद्य और मांसके प्रति प्रेम तथा घृणा दोनों होने लगते हैं। उसके सिरमें चक्कर आता है। इस रोगके होनेपर रोगीके नाखून, केश तथा अस्थि अपेक्षाकृत पहलेसे अधिक बढ़ते हैं। वह स्वप्नमें अपनी पराजय देखता है।
पतंग, कृकल (गिरगिट), साही, बंदर, कुत्ता तथा पक्षियोंसे भयार्त होकर अपनेको पराजित या गिरता हुआ देखता है। स्वप्नमें अपने शरीरके बाल तथा अस्थिभागको भस्म होते हुए देखकर वह भयभीत होता है। वह स्वप्नमें ही वृक्षपर चढ़ता है। उसे स्वप्नमें निर्जन ग्राम और देशका दर्शन होता है। जलरहित भूभागको देखनेके कारण उसे स्वप्नमें भय लगता है। उसको आकाशमें प्रकाशपुञ्ज तथा दावाग्निसे जलते हुए वृक्ष दिखायी पड़ते हैं, जिससे उस रोगीका मन भयसे व्याकुल हो उठता है। ये सब लक्षण रोगप्रभावके कारण ही होते हैं। अतः इसे पूर्वरूप कहते हैं।
इस राजयक्ष्मारोगके* कोष्ठगत होनेपर रोगीको पीनस, श्वास, कास, स्वरभंग, सिरपीड़ा, अरुचि, ऊर्ध्वनिःश्वास, शारीरिक शुष्कता, वधजन्य कष्ट तथा वमन होता है। उसके पार्श्वभाग तथा संधिस्थानमें पीड़ा होती है। उसका शरीर ज्वरसे संतप्त रहता है। इस प्रकार इस राजयक्ष्माके उक्त ग्यारह लक्षण रोगीके शरीरमें पाये जाते हैं। उनके उपद्रवसे रोगीके कण्ठमें ऐसी पीड़ा होती है जैसी श्वासमार्गमें विकृति एवं हृदयवेदना होनेपर होती है। उसे जम्भाई आती है, प्रत्येक अङ्गमें दर्द होता है, मुखसे बार-बार थूक निकलता है, मन्दाग्नि हो
* सु०उ० ४१, अ०हृ० नि०अ० ५।