भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२७२ संक्षिप्त गरुडपुराण [ आचार-

मनुष्यों तथा दुःशीलोंकी भूमि अर्थात् एकमात्र मदिरा ही अनेक मुखवाली दुर्गंतिकी आचार्य है। मदकी तीसरी अवस्थामें पहुँचकर मनुष्य निश्चेष्ट होता हुआ मौन होकर सोया रहता है। वह पापात्मा मरनेसे भी अधिक बुरी दशामें पहुँच जाता है। मद्यमें आसक्त मनुष्य धर्म-अधर्म, सुख-दुःख, मान-अपमान, हित-अहित, शोक-मोहकी अनुभूतिसे रहित हो जाता है। वह शोक, मोहादिसे समन्वित रहता है। ऐसा प्राणी उन्माद-भ्रम और मूर्च्छामें सदैव विद्यमान होता है और अन्ततोगत्वा मिर्गीके रोगीके समान भूमिमें गिरकर छटपटाता रहता है। जो व्यक्ति बलवान् हैं, समुचित भोजन करते हैं या यथाशक्ति प्रचुरमात्रामें भोजन करके पचा जाते हैं, उनमें मद नहीं होता है। यह मदात्ययरोग वात-पित्त तथा कफके प्रकुपित होनेके कारण उत्पन्न हुए अन्य सभी दोषोंसे होता है।

इस प्रकार वातिक, पैत्तिक, श्लैष्मिक और सन्निपातिक नामसे यह मदात्यय चार प्रकारका होता है। मोह, हृदयवेदना, पुरीषभेद, निरन्तर तृषा, कफ, पित्तज्वर, अरुचि, हृदयमें विबन्धता, अन्धकार, खाँसी, श्वास, निद्रा न आना, पसीना, विष्टम्भता, सूजन, चित्तविभ्रम, स्वप्नदर्शनसे घबड़ाहट, मना करनेपर भी बोलते रहना आदि—ये सब मदात्ययके सामान्य लक्षण हैं।

पित्तदोषके कारण मदात्यय होनेपर प्राणी दाहज्वर, स्वेद, मोह, प्यास, अतिसार और विभ्रमके कारण उपद्रवसे ग्रस्त होता है। श्लेष्मज मदात्ययरोगमें रोगी वमन, हल्लास (धड़कन), निद्रा तथा अग्निमान्द्यके कारण उदरकी गुरुताके दोषसे संत्रस्त रहता है। सन्निपातिक दोषवाले मदात्ययमें पूर्वकथित सभी लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। यह सब जानकर जिस प्राणीकी अभिरुचि सहसा मद्यपानमें हो जाती है तो उसमें ध्वंसक और शोषक—ये वातज व्याधियाँ हो जाती हैं। ये कष्टसाध्य होती हैं और विशेषकर दुर्बल मनुष्यको होती हैं।

ध्वंसकमें कफकी प्रवृत्ति, कण्ठशोष, अतिनिद्रा, शब्दका न सहना होते हैं, विक्षय (शोषक)-रोगमें चित्तविक्षेप, अङ्गमें पीड़ा, हृदय तथा कण्ठमें रोग, सम्मोह, खाँसी, तृष्णा, वमन तथा ज्वर होते हैं। अतः जो व्यक्ति जितेन्द्रिय हो, वह इन सभी बातोंपर विधिवत् पहले विचार करे। तदनन्तर वह मद्यके दोषसे अपनेको दूर कर ले। इसीमें उसका कल्याण है। मद्यसे दूर रहनेवाला शारीरिक तथा उन्माद आदि मानसिक विकारोंसे कभी कष्ट नहीं पाता है।

रजोगुण, तमोगुणकी प्रधानतावाले मोहजन्य दोष तथा असंयमित आहार करनेवाले प्राणीको मद, मूर्च्छा और संन्यास नामक तीन प्रकारके रोग होते हैं। यथा—शरीरमें इनका प्रकोप होनेपर ये तीनों रोग रस, रक्त और चेतनाके ही स्रोतोंके निरोध हो जानेसे होते हैं। इनमें मदसे मूर्च्छा और मूर्च्छासे संन्यास उत्तरोत्तर बलवान् होते हैं।

मदात्ययरोग मद, वात, पित्त, कफ तथा सन्निपातके दोषोंसे तो होता ही है, किंतु रक्त, मद्य और विषके कारण भी यह शरीरमें उत्पन्न हो जाता है। शरीरमें शक्तिकी अनन्तता न होनेके कारण जब शक्ति क्षीण हो जाती है तो प्राणी अपनी शक्तिका आभासमात्र करता है। उसकी चित्तवृत्तियाँ चञ्चल हो उठती हैं। वह छल-कपटके व्यवहारसे घिरा रहता है।

वातज मद्यसे मनुष्यका शरीर रूक्ष-श्याम और अरुण-वर्णका हो जाता है। पित्तज मद्यसे प्राणी क्रोधी हो उठता है। उसके शरीरका वर्ण लाल और पीला हो जाता है। वह कलहमें अभिरुचि लेता है। कफोत्पादक मदात्ययमें रोगी जब सोता है तो उसे स्वप्न दिखायी देते हैं। स्वप्नमें असम्बद्ध,