भारतकोश
गरुड़ पुराण

गरुड़ पुराण

Garuda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२८६संक्षिप्त गरुडपुराण[ आचार-

स्वरूपका परित्याग करनेवाले रक्त मूत्रका क्षरण करता है, उसको प्रमेहरोगके बिना रक्तपित्तरोग जानना चाहिये। रक्तपित्तरोगके प्रभावसे ही मूत्रका रंग हरिद्रा एवं रक्तवर्णका हो जाता है।

प्रमेहरोगोंके पूर्वरूपमें स्वेद, अङ्ग-विशेषमें अप्रिय गन्ध और अङ्गोंमें शिथिलता, शय्या, भोजन, निद्रा तथा सुखकी आसक्ति, हृदय, नेत्र, जिह्वा एवं कानोंमें असाधारण या साधारण भारीपन, जलन, बाल और नाखूनोंमें अभिवृद्धि, शीतल पदार्थोंके प्रति प्रेम, कण्ठ तथा तालुमें शोथ, मुखपर माधुर्यभाव और हाथ-पैरमें जलनके लक्षण दिखायी देते हैं। प्रायः इन सभी प्रमेहरोगोंके रोगीके द्वारा किये गये मूत्रपर चीटियाँ दौड़ने लगती हैं।

प्रमेहरोगमें तृष्णा, मधुरता तथा चिकनाहट का लक्षण तो सामान्य है, किंतु मधुमेह होनेपर अनेक प्रकारके विकारोंका जन्म हो जाता है। शरीरमें इस रोगके परिव्याप्त होनेपर इसकी उत्पत्तिका कारण कफजन्य मानना चाहिये अथवा सभी दोषोंके क्षीण हो जानेपर यदि प्रमेहका कोई विकार दिखायी देता है तो वह वायुजन्य होता है। प्रमेहके ये सभी प्रकार तो कफ और पित्तसे युक्त होते हैं, यथाक्रम जिनकी उत्पत्ति रति-प्रसंगकी आसक्तिके कारण रोगीके मूत्र-भागमें होती है। जो प्रमेह पित्तदोषके कारण उत्पन्न होते हैं, वे याप्य हैं। साध्य वही प्रमेय होता है जो अपने सम्पूर्ण लक्षणोंसे समन्वित होकर रोगीके शरीरमें दिखायी नहीं देता। यदि वह सभी लक्षणोंसे पूर्ण हो जाता है तो उसका निवारण असम्भव ही है। (अध्याय १४९)

विद्रधि एवं गुल्म-निदान

धन्वन्तरिजीने कहा—हे सुश्रुत ! अब मैं विद्रधि और गुल्मका निदान कहता हूँ, उसे आप सुनें।

बासी एवं अत्यन्त उष्ण, रूक्ष, शुष्क तथा विदाहकारी भोजन करनेसे, टेढ़ी-मेढ़ी शय्यापर टेढ़ा-मेढ़ा शयन करनेसे तथा रक्तको दूषित करनेवाले विरुद्ध आहार-विहारसे रक्त दूषित होकर चमड़ा (त्वक्), मांस, मेदा, अस्थि, स्नायु एवं मज्जाको दूषितकर यह उदरका आश्रयण करता है। दुष्ट रक्त जब उदरका आश्रयण करता है तो अङ्ग-विशेषमें (बाहरकी ओर मुँहवाला अतिशय शूलके साथ और अतिशय पीड़ासे युक्त वृत्ताकार अथवा भीतरकी ओर मुँहवाला आयताकार) जो शोथ उत्पन्न हो जाता है, आयुर्वेदवेत्ता वैद्यगण उसे विद्रधिरोग कहते हैं।

दोषोंके द्वारा (वायु, पित्त आदिके) भिन्न-भिन्न रूपमें या मिश्रितरूपमें रक्त एवं स्रावके तत्तत् अङ्गमें ग्रन्थिके आकारका विद्रधिरोग अतिशय दारुण, गम्भीर और गुल्मको बढ़ानेवाला होता है। वह वल्मीक अर्थात् दीमकके घरके समान सच्छिद्र होता है और सभी छिद्रोंसे सदा रक्त आदि बहता रहता है, इससे जठराग्नि मन्द हो जाती है। नाभिवृत्ति, यकृत, प्लीहा, क्लोम (वृक्क), कुक्षि, गुद एवं वंक्षण आदि स्थानोंमें विद्रधिरोग उत्पन्न होनेपर रोगीका हृदय सदा काँपता रहता है और विद्रधि-स्थानमें तीव्र वेदनाकी अनुभूति होती है।

विद्रधिका शोथ श्यामवर्ण अथवा रक्तवर्णका होता है। इसका ऊपरी भाग उन्नत रहता है। कालान्तरमें पाक हो जानेसे यह विषम आकारका हो जाता है। विद्रधिरोगमें संज्ञा-नाश, भ्रम, अनाह, रक्तस्राव और अव्यक्त शब्द होता है। पित्तज विद्रधि रक्त (लाल), ताम्र अथवा कृष्णवर्णका शीघ्रपाकी होता है। इसमें तृषा, दाह, मोह, ज्वर,


१-वा०नि० १०। २-च०सू०अ० १७, सु०नि०अ० ९।